Saturday, November 7, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग-10

काश, हम लोग पहले मिले होते तो इस तरह का सुख तब भी भोग सकते थे, मगर राज की एक बात यह भी है की यह सुख अभी कुछ नहीं है, शुरुआत भर है , जब यहाँ से आगे बधोगी तो पता चलेगा की प्रणय क्रीडा का असली आनंद क्या होता है ? जानोगी वो खेल ?
स्वीटी- अब , जबकि तुमसे दोस्ती हो गयी है, प्यार हो गया है तो जो कुछ भी कहोगे, वही सुनूंगी और वही मानूंगी। अब मैंने यह प्राण कर लिया है की मोहब्बत के इस सफर में कभी अकेली नहीं चलूंगी, कोई दूसरा हमसफ़र भी मेरे साथ नहीं होगा । जीवन का यह सफर बिन तुम्हारे अधूरा है। साथ- साथ चलेंगे , साथ -साथ रुकेंगे । जो भी होगा वह तुम्हारी मर्जी से होगा,समझे ।
राज - वाह। कैसी किस्मत लिखवाकर लाया हूँ मैं। जी चाहता है तुम्हें अपने जिस्म में समा लूँ और फ़िर हमेशा के लिए तुम्हें अपने दिल में कैद करके रख लूँ।
स्वीटी- तो इससे इनकार किसको है। जो भी जी चाहता है वह करो। मेरी तरफ़ से तुम्हें सहयोग ही मिलेगा ।मैंने सब कुछ अब तुम पर ही छोड़ दिया है। तुम फैसला करो । जो भी करना वह सोच समझ कर करना क्योंकि मैं तो तुम्हारे प्यार में मद होश हो चुकी हूँ , मुझे कुछ भी ध्यान या ज्ञान नहीं है।
राज- और मेरे दिल का हाल समाजः रही हो , मुझे कुछ नहीं मालूम की तुमसे इतनी बातें कर कैसे रहा हूँ, वो कौन सी शक्ति है जो मुझे तुमसे बात करने के लिए प्रेरित कर रही है। शायद तुम्हारे प्रेम की ताकत की वजह से यह सब हो रहा है । कोई बात नहीं , जब तुमने सब कुछ मेरे ऊपर सब कुछ छोड़ा है तो फ़िर मैं सही फैसला ही करूँगा।
स्वीटी- तुम कितने अच्छे हो । मेरे सबसे प्रिय हीरो तुम ही तो हो ।
राज- तो फ़िर मुझे कभी भी अकेला तो नहीं छोडोगी । अपना बनाकर कभी दिल तो नहीं तोडोगी?
स्वीटी- नहीं मेरे राज, मैं हरगिज ऐसा नहीं कर सकती। तुम्हारी खातिर मैं किसी भी गम से दो चार होने को तैयार हूँ, किसी भी दुःख तकलीफ से टकराने के लिए तैयार हूँ। मैं कभी तुम्हें दुखी नहीं देख सकती, दुःख देने की बात तो अलग है।
राज भावुक हो गया। उसने स्वीटी को मजबूती से जकड़कर एक झाडी के अन्दर कर लिया। यह घनी झाडी थी और इसके अन्दर जाने पर बाहर से कुछ दिखाई ही नहीं देता था, इसीका फायदा उठाकर वहाँ पर प्रेमी जोड़े अक्सर अपने जिस्म की प्यास बुझाया करते थे। यह पार्क इसी तरह का था। यहाँ पर लड़के -लड़कियां आकर अपने दिल की बातें एक दूसरे को बताया करते थे। राज भी यहाँ पर अपने किसी ऐसे दोस्त के साथ आया था जो अपनी महबूबा को साथ लेकर आया था। अब वह उसी का इन्तजार कर रहा था की अपनी सहेली का इन्तजार करती हई स्वीटी उसे मिल गयी। बातचीत करते-करते वे दोनों पार्क के अन्दर चले गए और फ़िर दोनों की जुबान पर प्यार के शब्द नाचने लगे। आखिरकार दिल की बातें बाहर आ गयीं और वे दोनों एक जिस्म दो जान बन्ने की राह पर अग्रसर होने लगे। दोनों खूबसूरत , नौजवान थे और दोनों ही इस वक्त एक झाडी के अन्दर अकेले थे । ऐसे समय पर तो वैसे भी काम्भाव्नाएं भड़क उठती हैं। राज और स्वीटी के दिल में भी गज़ब की आग भड़क उठी थी , उसे पता ही नहीं था की यह हो क्या रहा है । स्वीटी बार- बार गर्म आहें भर रही थी। राज ने उसके संवेदनशील अंग पर जब अपने होठ का स्पर्श किया तो स्वीटी के तन मन की ज्वाला और भी भड़क उठी । वह कहने लगी-
-यह क्या कर रही हो मेरी जान। क्या मार डालने का इरादा है ? मेरा तन- मन जल रहा है। भूचाल सा आया हुआ है। क्या इस अग्नि को शांत करने का दूसरा कोई कोई तरीका है क्या ?
राज - दूसरा तरीका , मैं समझा नहीं । आख़िर यह आग तो एक ही रास्ते से बुझाई जा सकती है।
स्वीटी- नहीं मेरी जान , दूसरा रास्ता तो निकालना ही होगा। इसके बिना काम नहीं चलेगा।
राज - मगर पहले तो तुमको कोई ऐतराज नहीं था, अब अचानक यह क्या हो गया ?
स्वीटी- मैं सोच रही थी की इस तरह से सम्बन्ध बनाना ठीक नहीं होगा, हामारे पास सुरक्षा का कोई उपाय जो नहीं है। अब तो मैं यही चाहती हूँ की कोई सादा सा उपाय मिल जाए तो हम दोनों ही इस अपराध से बच जाएँ ।
राज- अपराध ? किस अपराध की बात कर रही हैं आप ? प्रेम करते हैं हम दोनों। एक दूसरे से मोहब्बत करना कोई पाप तो नहीं ? अगर हम लोग एक दूसरे के जिस्म से सत्कार कोई सुख हासिल कर सकते हैं तो ऐतराज क्या है , दिक्कत क्या है ?
स्वीटी- दुनिया नहीं समझती यह सब ? और बीमारी भी नहीं समझ पाती । जिसे लगनी होती है , लग ही जाती है।













No comments: