Thursday, November 26, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग-29

जी चाहता है मैं नाचने लागून, खूब जोर -जोर से नाचूं। मन का मयूर नृत्य कर रहा है। जीवन से पहले तो मोह था ही मगर अब बहुत बढ़ गया है। अपने आप से भी मोहब्बत हो गयी है । किसी ने सच ही कहा है की किसी दूसरे से प्यार करने से पहले हमें अपने आप से प्यार करना होगा। उसके बिना दूसरों को चाहना सम्भव नहीं और जब दूसरे किसी से आँखें लड़ गयीं तो फ़िर अपने आप पर भी ध्यान चला ही जाता है।
राज- तुम तो फिलोस्फर बनती जा रही हो, धीरे- धीरे इतनी गहराई में उतरती जाती ही जैसे कोई शायर हो।
स्वीटी- शायर से कम भी नहीं हैं, ठीक कहते हो लगता है बहुत जल्दी मैं भी शायरी लिखने लगूंगी।
राज- सच तो ये है की तुम्हारी जुबान से निकले शब्द बहुत अर्थवान लग रहे हैं, जैसे की उनमे कुछ रहस्य या रिसर्च छिपा हुआ हो। विद्वान लेखक भी तो ऐसा ही करते हैं।
स्वीटी- अच्छा , अब मक्खन बाजी पर उतर आए , इतनी विद्वान भी नहीं हूँ की तुम झाड पर चढ़ाए जाते हो।
राज- नहीं यार , तुम्हें पीने में ऐसा लग रहा है। मैं तो वही कहता हूँ जो की सच है।

No comments: