Wednesday, November 18, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग-21

राज- जाने भी दो यार। रहने भी दो। जब बात और थी, अब की बात और है। अब देखना कल से तुम ख़ुद ही मेरे से कतराने लगोगी, तुम्हारे प्यार का सुरूर मेरे सर चढ़कर बोलने लगा है। अब मैं पीछे हटकर देखने वालों में से नहीं हूँ। तेल देखो, तेल की धार देखो।
स्वीटी- ठीक है। तुम्हारी ये चुनौती मुझे मंजूर है। मुझे आश्चर्य हो रहा है, मैं मान ही नहीं सकती की एक शर्मीला युवक अचानक इतना आधुनिक कैसे हो सकता है ? मुझे ज़रा भी यकीं नहीं आ रहा है।
राज- तुम हुस्न की परी हो, पहली ही नजर में आंखों में बसने वाली हो, सूरत इतनी मोहिनी है की जो एक बार देखले वह हमेशा के लिए दीवाना हो जाए। मेरी तरह। इस वक्त तुम्हें मेरे शब्द फ़िल्मी डायलोग लग रहे होंगे, मगर मैं जो कहता हूँ वह सोलह आने सच होता है। मेरी आंखों में झाँक कर देखो तुम्हें सच्चाई नजर आएगी।
स्वीटी- इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है। मैं जानती हूँ। तुम्हारी मोहब्बत को पहचान गयी हूँ।
राज- सच ? अगर ऐसा है तो अभी और इसी वक्त मुझसे शादी करने का वादा करो ।
स्वीटी -अगर ऐसा होता है तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होगी। हमेशा हमेशा के लिए अगर तुम्हारे निकट रहने का मौक़ा मिलता है तो इनकार कौन करेगा , खासकर मैं तो किसी कीमत पर भी नही। तुम बस उसी बात को लेकर बैठे हो की मैंने पीर महाराज के सामने शादी करने के लिए तुरंत हामी क्यों नहीं भरी । अरे बाबा , जल्दी का काम शैतान का होता है। ये कहावत तुमने सूनी की नहीं ?
राज- इस वक्त मैं ख़ुद भी एक कहावत बन चुका हूँ। तुम्हारे इश्क में इतना डूब गया हूँ की और कुछ याद नहीं रहता। तुम करीब होकर भी दूर लगती हो। मन में दहशत सी लगी रहती है।
स्वीटी- ये सब वहम है तुम्हारा। इस वहम की दवा मैं अभी किए देती हूँ, मगर परहेज करते रहना ।
राज - इलाज ही करना है तो प्रेम रोग का करदो। जिस रोग ने दिन का चैन, शाम का सुकून और रातों की नींद हराम करदी है।
स्वीटी- झूठे, आज ही मुलाक़ात हुई है और आज ही कह रहे हो की रातों की नींद हराम हो गेई,
राज- तो क्या हुआ, अभी नहीं हुई तो हो जायेगी । मुझे पता चल गया है।
स्वीटी- ठीक है बाबा, तुम जीते मैं हारी । अब तो कम से कम पीछा छोडो ..घर भी चलना है की नहीं ?
राज- नहीं । और बोलो। यह माना की शादी के लिए विचार करने की जरूरत होती है, घर के लोगों को समझाने -बुझाने की जरूरत होती है मगर प्यार के मामले में तो ऐसा कुछ नहीं है।
स्वीटी -प्यार हो तो गया, और कितना प्यार करोगे ? किसी और दिन के लिए भी कुछ कसार छोडनी पड़ेगी ।
राज- दिल में जितनी भी हसरतें हैं आज उन सबको पूरा करने का समय आ गया है। मैं कोई भी कोर कसार छोड़ने वाला नहीं हूँ। समझी आप ? अगर मना करोगी तो भी नहीं।
स्वीटी- समझ गयी, मगर तुम भी समझ लो की ये प्यार नहीं बलात्कार होता है। अगर किसी लड़की की इच्छा के ख़िलाफ़ कोई उसका यौन शोषण करता है तो तो वह बलात्कार हियो तो कहलाता है , और किसको कहते हैं बलात्कार ? उसकी कोई दूसरी परिभाषा तो नहीं होती ।
राज- होती है सरकार। जरूर होती है। हम उससे निबट लेंगे । मुकदमा तो दिल की अदालत में ही चलने वाला है की कही और चलेगा , दुनिया की अदालत में तो नहीं ना।
स्वीटी- बड़े घाघ हो, क्या तुम तुम जेल जाने से नैन डरते ?
राज- फांसी पर भी चढ़ना पड़े तो कोई इनकार नहीं है। तुम्हारे प्यार को पाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर सकता हूँ। हर हद को पार कर सकता हूँ।
स्वीटी- जो मैं कहूँगी , वो करोगे ?
राज- कहके तो देखके , आदेश पर फ़ौरन अमल किया जाएगा।
स्वीटी- अगर मैं कह्तियो हूँ की आज मुझे छोड़ दो प्लीज, तब क्या करोगे ? मान लोगे बात ?
राज- हाँ, एक शर्त होगी मगर ।
स्वीटी- प्यार में कोई शर्त नहीं होती। जो कह दिया सो सामने वाले ने सहर्ष मान लिया।
राज- ध्यान से देखोगी तो पाओगी की इस नियम का उल्लंघन भी तो आपने ही किया है। आपने ही पहले मेरी बात काती, मेरी इच्छा थी की मैं तुम्हारे साथ प्रणय क्रीडा करुँ लेकिन तुमने एक झटके में ही मना कर दिया
,स्वीटी- यह इल्जाम है हम पर।
राज- अगर तुम्हें ऐसा महसूस होता है तो कोई बात नहीं। मैं अपनी बात वापस लेता हूँ।





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