Friday, November 27, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग-30

मैंने बहुत कुछ सुन रक्खा है इस बारे में, दरअसल ये व्यापारी भी गज़ब होते हैं। अपने फायदे के लिए दूसरों की जिन्दगी से खेलने से ज़रा भी बाज नहीं आते।

वे दोनों कुछ देर तक इसी तरह की बातें करते रहे और साथ ही एक दूसरे के जिस्म से खेलते रहे। यह अनद बहुत अच्छा था, सुख ही सुख था। मन में हजारों ख्वाहिशें पल रही थीं। दिल धक् धक् रहा था। ऐसा महसूस होता था जैसे सारी दुनिया थम गयी हो , और स्वीटी -राज ही सबके ऊपर हों। इसी तरह की सुखद अनुभूतियों और अश्लील फ़िल्म को देखते -देखते उनके तन -मन में काम वासना की आंधी उठने लगी। जिस तरह टीवी में चल रही फ़िल्म का नायक सहवास कर रहा था ठीक उसी तरह राज भी खेल खेलने का प्रयास कर रहा था। स्वीटी भी उत्सुक थी। उन दोनों की साँसें बहुत जोर-जोर से चलने लगीं। स्वीटी की गोलाइयों से राज बच्चों की तरह खेल रहा था, उनको सहला रहा था , साथ में कह भी रहा था-

- यह तो स्वर्ग जैसा सुख है, मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी की इस तरह का अनंत सुख भी कभी भोगूंगा, सच तो ये है की मैंने कभी जाना ही नहीं की जीवन इतना रंगीन भी हो सकता है। तुम मिली हो तो ये मस्तियाँ, ये रंगीनियाँ मिली हैं। मेरा उत्साह देखो, मेरा जोश देखो।मैं एक दिन में ही अपना पूरा जीवन जी चुका हूँ , वो भी पूरे सुख के साथ , संतुष्टि के साथ। खूब मजा आ रहा है।
स्वीटी- हाँ यार , इनका शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। अब हम रोजाना इस आनंद को उठाएंगे। राज- हाँ, मगर हमको एक टाइम फिक्स करना होगा , कहीं ऐसा ना हो की मैं पागल हो जाऊं, याफिर मेरी साँसें ही थम जाएँ। मुझे इस इश्क का कोई इलाज बताओ , मैं अकेली रह ही नहीं सकती , किसी भी कीमत पर और किसी भी हालत में।
राज- जुदा होने के लिए तुमसे कौन कमबख्त कहता है, अपनी इच्छा के अनुसार जो भी करना चाहो कर सकते हो, हम दोनों बालिग़ हैं, अर्थात हम लोग अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं। तब हमको निराश नहीं होना चाहिए, हमको हमेशा पोजीटिव बने रहना चाहिए।
स्वीटी - हाँ, अब मैं भी इसी नजरिये पर गौर करना चाहूंगी, तुम बहुत समझदार हो, मैं समझती हूँ की तुम जीनियस हो, एक ऐसा जीनियस जो विपरीत परिस्थितियों में भी बहुत आचा काम कर सकते हो।
राज- अब इतनी तारीफ़ भी न करो की मैं घमंडी हो जाऊं ।
स्वीटी- मुझे तुमसे इस तरह की कोई आशा नहीं है। मैं जान गयी हूँ तुमको।
राज ने गौर किया की स्वीटी का चेहरा उसकी जुबान का साथ नहीं दे रहा था, उसे समझते हुए देर नहीं लगी की स्वीटी अपने मन से कुछ नहीं कह रही है बलिक नकुछ न कुछ कहने की मजबूरी है , इसलिए सिर्फ़ कहने के लिए कुछ कह रही है। उसने स्वीटी के घुत्न्र मोड़ दिए और उनको दोनों तरफ़ फैलाकर यौवन द्वार की तरफ़ उँगलियाँ बढ़ाने लगा। काफी देर के बाद स्वीटी के चेहरे पर मुस्कान उभरी। उसने स्वीटी के पंखुड़ी जैसे नर्म और मुलायम होठों को चूम लिया। स्वीटी

ने उसका जोश के साथ दिया। इतने जोश के साथ की अब वह अपने होठों को सहलाने लगी थी। उसके बदन में जोरदार विस्फोट हो रहे थे, इतने जोश और होश में उसने कहा-

-आह, अब मैं परेशान हो चुकी हूँ, अब मुझे शान्ति चाहिए, सुकून चाहिए । अब मुझे प्यार की जरूरत है, अब संतुष्टि की जरूरत है। प्लीज अब न सताओ । आह......

राज- जब इतनी देर से खामोश हो तो थोड़ी देर और चुप रहो, हमारी मंजिल अब दूर नहीं है।

स्वीटी- अरे लेकिन मैं तो मछली की तरह तड़प रही हूँ । देखते नहीं , मेरा कैसा हाल हो रहा है।

राज - काश , तुमने मेरे सीने पर भी हाथ रखकर देखा हो। इधर कान लगाकर तो देखो , मैं भी परेशान हूँ मगर जानता हूँ की यह दुःख ज्यादा देर के लिए नहीं हैं।

राज ने अब फायर करने में ही भलाई समझी। अब उसने जोरदार आक्रमण कर दिया। स्वीटी की फ़िर एक बार चीख निकल गयी। वह असमंजस में थी। रोये की हँसे उसकी समझ में नहीं आ रहा था। उसे थोड़ा सा दुःख भी हो रहा था और मजा भी आ रहा था।

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