Wednesday, November 11, 2009

मोहब्बत के मसीहा , भाग-14

स्वीटी को बेचैनी महसूस हो रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था की आख़िर क्या करे , प्यार के आवेश में तो उसे कुछ भी याद नहीं आया था।इस वक्त जब परेशानी हुयी तो सब याद आया। उसने राज की तरफ़ देखा, उसके चेहरे से बेबसी साफ़ झलक रही थी। उसने पुछा -
- यहाँ से मुख्य सड़क कितनी दूर है ? क्या हम पैदल नहीं चल सकते ?
राज- बहुत दूर है। डरावना मंजर है, कुछ समझ में नहीं रहा । अब तो कुछ करना ही होगा। चलो, पैदल ही निकलते हैं। जो होगा सो देखा जाएगा , तुम घबराना मत। यहाँ पर भले ही खतरनाक जानवर हैं मगर हम भी किसी से कम नहीं। मैं अकेला ही दो आदमियों से निबट सकता हूँ। मैं अपनी बेल्ट निकालकर हाथ में लेलेता हूँ।
स्वीटी- अच्छा , क्या कोई ऐसा काम नहीं हो सकता की तुम्हारा कोई दोस्त गाडी लेकर यहाँ आजाये । मुझे थोड़ा सा डर लगने लगा है। मैं अपनी जिस सहेली को फोन लगाती हूँ , नेटवर्क काम ही नहीं कर रहा ।
राज- हाँ ये तो है। सारी परेशानी यही है। मैं किसी से संपर्क ही नहीं कर पा रहा हूँ। यहाँ तक की मैसेज भी नहीं कर पा रहा । अब तो हमको ख़ुद ही चलना होगा। अच्छा होता की हम पार्क से ही नहीं आते। कम से कम वहाँ पर सुरक्षित तो थे, वहाँ पर कई दुकाने थीं, फोन की सुविधा था। अब हम वहाँ से भी काफी दूर आ चुके हैं,मेरे ख़याल से अब पीछे हटने से कोई लाभ नहीं होगा ।
स्वीटी- हाँ , मैं भी यही सोच रही हूँ। आगे चलते हैं , शायद कोई रास्ता निकल आए ।
राज ने उसका हाथ कसकर थाम लिया और दोनों मुख्य सड़क की तरफ़ चलने लगे, अचानक बेमौसम बरसात होने लगी, हवाएं और तेज हो गयीं, ये बदन चीरती हुयी हवाएं थीं, सड़क पर कहीं दूर-दूर लाईट जल रही थीं , जो बारिस के बाद बंद हो गईं, सड़क पर अब घुप्प अँधेरा था। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, वे सड़क के किनारे -किनारे चलना चाहते थे मगर वहाँ पेड़ पौधे थे, झाडियाँ थीं, उधर से कुछ भी अनहोनी हो सकती थी। उसी अनहोनी को टालने के लिए राज अब स्वीटी को लेकर बीच सड़क पर चल रहा था, वह जानता था की इससे खतरे की आशंका थी। आगे या पीछे से कोई वाहन आ सकता था और उन्हें कुचलकर जा सकता था या फ़िर बीच बीच में जो गड्ढे उन्हें पड़ रहे थे, उनसे पाँव टेढ़े -मेधे पड़ रहे थे, कोई बड़ा गड्ढा भी तो आ सकता था। मगर अब इतने रिस्क तो लेने ही थे। इसीमे भलाई थी।वे चल ही रहे थे की उन्हें कोई भीमकाय अआवाज सुनाई दी। उस आवाज में इतनी दहशत थी की स्वीटी ने अपने कान बंद कर लिए । थोड़ी देर के लिए तो राज ने भी अपने कानों पर हाथ रख लिए मगर फ़िर वह जल्दी ही संभाल गया। उसने कड़ककर पूछा-
-कौन हो ? क्या कर रहे हो उधर ? मेरा जवाब दो ।
- मैं तुम्हारा काल हूँ, तू दोनों को अपने साथ लेकर जाऊँगा। तुमने मुझे समझ क्या रखा है ?
राज- हमने क्या किया है ? कोई भूओल हो तो बताओ , तुम क्यों मारना चाहते हो हमको ?
- क्योंकि तुमने मेरे इलाके में आकर भी मुझे सर नहीं झुकाया ? राजा हो या रंक यहाँ सब मुझे नमन करते हैं।
स्वीटी=- हमको क्या पता था, हम अब आपको नमन कर लेते हैं । नमस्कार जी। - खामोश, मजाक उडाती हो हमारा । हम ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करंगे ।
राज- आप अपना नाम तो बताइये , हम आपको पहले से जानते हैं क्या , मतलब आप हमको जानते हैं क्या ?
-तो क्या ? सिर्फ़ तुमको ही नहीं सरे जहाँ को जानते हैं हम। हम पीर हैं । तुमने मेरी मजार को ठोकर मारी है, अपमान किया है मेरा । मैं अब छोदुँगा नहीं तुमको। अपनी तरह ही पत्थर बना डालूँगा।
स्वीटी- ऐसा गज़ब मत करिए , हम तो पहले से ही बहुत टेंशन में हैं, हमने जानबूझकर कुछ नहीं किया , अंधेरे के कारण ऐसा हो गया होगा । शायद इसीलिए आपने उजाला बंद किया है,। माफ़ कर दीजिये हमें।
- नहीं , इस गलती की एक ही माफी है , मौत ।
राज- नहीं, भगवान् के लिए ऐसा मत कीजिये । अभी तो हमने शादी भी नहींकी, हम जीना चाहते हैं। हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं। आज अचानक यहाँ फंस गए , आप तो सारी दुनिया को जानते हैं। मन की बातों को भी जानते ही होंगे, फ़िर तो समझ ही गए होंगे की हमने सोच समझकर कुछ नहीं किया।
- हूँ..... ठीक है । इस बार तो माफ़ कर देता हूँ मगर हर गुरूवार को तुम्हें यहाँ दीपक जलने आने पड़ेगा। तुम दोनों आओगे , शाम होते ही अगर एक साल तक हर गुरूवार को दिया नहीं जलाया तो तुम लोगों के जीवन का दीपक भी बुझ जाएगा , समझे........








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