Thursday, October 7, 2010

लवगुरु-६०


केशव वासना के ज्वालामुखी में तपने लगा . उसने आगे बढ़कर रानी को अपने कब्जे में ले लिया और उसके गालों से अपने होठ सटाने लगा . उन दोनों के बदन से आग दहक
रही थी, उन्हें देख-देखकर बिजली भी अपने ऊपर से नियंत्रण खोने लगी. उसने अपने दोस्त को फोन घुमाया -
- हेलो , कैसे हो अमित ? कितने दिन हुए मुलाक़ात नहीं हुई .किधर हो ?
अमित- ओ हाय ... मैं ठीक हूँ बिजली, इतनी रात गए कैसे फोन किया ? मैं घर पर हूँ यार सो रहा था . इस समय और भला कहाँ हो सकता हूँ ? सब कुछ ठीक तो है न . अगर कुछ खास
नहीं तो सुबह बात करते हैं. ओके ... बाय...
उसका फोन कट चुका था , बिजली ने उसे ऐसे ही फोन लगा दिया था , उसका कुछ खास उद्देश्य तो था नहीं, ' तो फिर अमित को फोन क्यों लगाया ' उसने अपने आप से ही सवाल कर डाला.
शायद मन बहलाने के लिए उसने ऐसा किया था. केशव के साथ अपनी माँ को आपत्तिजनक अवस्था में देखकर उसका दिल डोलने लगा था , मन बहकने लगा था. दिल के किसी कोने में यह इच्छा दब
रही थी कि काश वह भी अपनी माँ की तरह क्रीडा कर सके, वह भी ऐसी ही सीत्कार भरे जिससे कि उसका साथ बी ही उसके गालों को चूमने लगे, उसके होठों को चूमने लगी . उसने सोचा कि इस खेल में
तो शायद बहुत ज्यादा आनंद आता है, तभी तो उसकी माँ अपने पति को छोड़कर एक नाकुछ नौकर के साथ इंजॉय कर रही है. बिजली का यह पहला मौक़ा था , जब उसने किसी मर्द और औरत को एक
ही बिस्तर पर एक साथ मौज -मस्ती करते हुए देखा था. वह आहिस्ता-आहिस्ता जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी, उसके सीने के आकार में भी बदलाव हो रहा था . कली धीरे -धीरे खिलने के लिए
बेताब हो रही थी, अब उसकी समझ में आया कि यह बदलाव क्यों हो रहे हैं. अगले ही पल उसने केशव को देखा कि वह किसी अबोध बालक की तरह उसकी माँ के उभारों को चूस रहा था. बिजली केलिए
अब हर पल कठिन होता जा रहा था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे, एक बार को भावनाओं का ऐसा तूफ़ान उठा कि दरवाजा खटखटाकर अंदर कमरे में घुसने का ही मन बना लिया. उसने सोचा
कि इसमें बुरा ही क्या है ? वह अंदर जाकर अपनी माँ से कहेगी कि या तो उसे भी ऐसा ही आनंद दिलाए वरना वह शोर-शोर मचा-मचाकर सबको बता डालेगी . फिर अगले ही पल उसे ख़याल आया कि इससे बवंडर
मच सकता है . उसके पास क्या सबूत है कि वह इस बात को साबित करे, उसने सोचा कि कैमरा लाकर उन दृश्यों को कैद करले , ,मगर ऐसा भी सम्बह्व नहीं दिख रहा था . क्योंकि जिस दरार से वह अंदर
की रासलीला को देख रही थी, वह दरार इतनी बड़ी नहीं कि वह फिल्मांकन कर सके. उसे ध्यान आया कि उसके मोबाइल में भी तस्बीर खींचने की सुविधा है , उसने काफी प्रयास किया मगर फोटो निकालने
में सफलता नहीं मिल पाई. थक हारकर वह दरवाजे से कमर टेककर खड़ी हो गयी और जिस तरह से केशव उसकी माँ के उरोजों को दबा रहा था वह खुद ही अपने हाथों से दबाने लगी. उसे भी थोड़ा-थोड़ा सा
मजा आने लगा,बेडरूम से आने वाली आवाजें और भी उत्तेजक होती जा रही थीं, बिजली ने अपना सिर झुकाकर अपने होठ सीने तक लाने की कोशिश की मगर कोई फायदा नहीं हुआ. आखिरकार कुदरत ने
महिला और पुरुष को अलग-अलग रूप में इसिलए तो बनाया है. उसके कानों में केशव की फुसफुसाहट सुनाई दी , वह कह रहा था-
-मैं खा-खाकर भी दुबला-पतला होता जा रहा हूँ और तूम हो कि बिना कुछ कहाए भी रोजाना डील छोडती जा रही हो . इस मोटापे पर थोड़ा सा कंट्रोल करो वरना बहुत परेशानी हो जायेगी , अब तो काम
निकल भी जाता है मगर आगे चलकर तकलीफ हो जायेगी , कभी सेठजी इस तरह की शिकायत नहीं करते क्या ?
रानी- देख रही हूँ कि अब चिड़ियों के भी पर निकलने लगे हैं, तुम भी सेठ की भाषा बोल रहे हो, बोलती हूँ कि उस नामुराद का नाम मत्लो तो बार-बार उसका नाम ले रहे हो . पानी लग गया
है, ऐसा लगता है . अपने काम को ठीक तरह से अंजाम दे न, अगर ज्यादा ही दुबला हो रहा है तो अगले महीने से तनख्वाह में हजार रुपये और बढ़ा दूंगी , बादाम -सादाम खाया करो , सेहत बनाया करो .
केशव- हजार रउपाए में क्या होता है मैडम, कुछ नहीं आता. घरवाली भी अब हजार रुँप्ये वाली साड़ी नहीं पहनती , उसे भी मंहगी-मंहगी सादिया चाहिए .
रानी- मैं एक बार पहनने के बाद दोबारा साडियों को कब पहनती हूँ. तू ले जाया कर . एक-एक लाख की सादिया हैं, चल हर महीन दो चार साडियां ले जाया कर . पत्नी के लिए मेकप का सामान भी
ली जाया कर. तेरी पत्नी भी खुश और तेरा भाई भी खुश . वैसे करता क्या है तेरा भाई ?.
केशव- कुछ नहीं, गाँव भर में आवारागर्दी करता फिरता है. कमाने के लिए मैं हूँ, खेती से भी आ जाता है, पट्ठा हीरो बना घूमता है.
रानी- अगर ज्यादा गर्मी है तो उसे यहाँ पर बुलाले, उसे भी नौकरी पर रख लूंगी , तू अकेला थक जाता होगा , तुझे भी आराम मिल जाया करेगा. एक दिन तू मेरी सेवा करना , एक दिन वह कर लिया
करेगा, जब मुझे कोई तकलीफ नहीं है तो तू क्यों परेशान होता है ?
केशव- ऐसा ठीक रहेगा क्या ? थोड़ा सा अजीब लगेगा कि जिसके साथ मैं रात गुजारता हूँ वह मेरे भाई के साथ भी रात गुजारे .

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