लवगुरु-५६
डोली- मैं आज तक भी इस बात को नहीं समझ पाई कि आप जैसे मर्दों को औरत के सीने को सहलाने से क्या मिल जाता है, अरे जों भी प्रतिक्रया होगी वह तो हमारी
तरफ से होगी न, आपको भले इससे क्या फर्क पड़ता है ? मेरे कहने का अर्थ है कि आप लोगों को क्या आनंद आ जाता है और कैसे आ जाता है , मैं नहीं जान पाई
इस बात को , अब मेरे सीने को देखकर आपको नशा कैसे चढता होगा यह मेरी कल्पना से बाहर की बात है . ये सभी तो मांस के लोथड़े हैं. इस जिस्म के अंदर हड्डियां
हैं, खून है , सब बेकार की चीजीं हैं. इनमे उलझकर मर्द सब कुछ क्यों भूल जाते हैं ? क्या है मेरे पास ? आप ही बताओ. अरे इंसान के लिए सबसे जारूरी चीज होती है
दौलत, वो तो आप जैसे धन्नासेठों की गुलाम है. हमेशा आपकी तिजोरियों में कैद रहती है . उससे जोक हाहो खरीद लों , सब कुछ बिकता है यहाँ.
मुंशीजी - मैं तुम्हारी बात को काटूंगा तो नहीं, लेकिन इतना दावे के साथ कहना कहाहुंगा कि हर चीज बिकती होगी बाजार में, मगर मोहब्बत खरीदने की चीज नहीं होती ,
बेचने की कहीज नहीं होती, जिस किसीके पास भी मोहब्बत की यह दौलत होती है, वह गरीब कहाँ होता है , सबसे अमीर तो वही होता है . क्योंकि सच्ची मोहब्बत किस्मतवालों
को मिलती है . और हां, अगर यह शरीर रक्त और हड्डियों का है तो फिर संसार में और भी ऐसा क्या है जों इनसे कुछ अलग हो, कुछ खास हो , मुझे नहीं लगता कि तुम कुछ
कह पाओगी, बता पाओगी . शायद ऐसा हो सकता है कि जिसके पास दौलत हो उसे दौलत महत्वपूर्ण नहीं लगती और जिसके पास हुस्न हो तो उसको यह खास नजर नहीं आता , इसी तरह जिसके
पास मोहब्बत का खजाना हो, उसे मोहब्बत की कद्र नहीं होती.
डोली- मुझे लगता है कि आज मेरी जुबान लडखडा रही है . अगर चलूंगी तो संभवतः कदम भी लडखडाने लगेंगे. मुझे बहुत चढ गयी है क्या ? अआप्को तो कुछ फर्क नहीं पड़ा. मर्द
हो न, आपको पहले से आदत होगी, अगर आदत नहीं हुई तब भी झेल जाओगे और मैं ठहरी कमजोर , मुझे अगर पहले से ही पीने की आदत होती तब भी नहीं बर्दाश्त कर पाती . मगर
आप चिंता मत करो, मैं पूरा मजा दूंगी , मजा किरकिरा नहीं हिने दूंगी , आखिरकार आपने मेरे ऊपर लंबी रकम खर्च की है , उसे यूं ही बेकार नहीं जाने दूंगी , मेरा यकीन मानो , मैं किसी को भी निराश नहीं करती, सबका ध्यान रखती
हूँ, सबको सामान मजा देती हूँ, आपकी रात बेकार नहीं जाने दूंगी, लोग बड़ी हसरत से इस रात क०ओ खरीदते होंगे .
मुंशीजी- क्या ? ये क्या कह रही हो डोली, लगता है सचमुच तुम्हें चढ गयी है , ये क्या कह रही हो कि किसीकी रात खराब नहीं करती.
डोली- मैं तो मिसाल दे रही हूँ, मेरा मतलब ... मतलब ... मतलब ये था कि मेरी जगह पर अगर कोई और भी होती तो आपको आपकी रकम के बदले पूरा इंजॉय कराती , आज मैं
समझती हूँ कि मेरी भी वही जिम्मेदारी है. तो मुझे अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए , मैं कामचोर नहीं हूँ. आज मेरा दूसरा ही दिन है , मैं अपने काम को ठीक तरह से अंजाम देना
चाहती हूँ, मेरे कहने का गलत अर्थ मत लगाना , ठीक है न .
मुंशीजी- ठीक है, चलो एक -अक पैग और बनाओ , मैं भी अब बहकना चाहता हूँ, जब तक मास्टी नहीं आयेगी तब तक हम दोनों एक जैसे नहीं हो जाते , मैं देखना चाहता हूँ, यह
महसूस करना चाहता हूँ कि उस लेबल पर जाकर आदमी को क्या महसूस होता है , वह किस तरह की बात करता है .?
डोली बार-बार अपनी पलकें मूँद और खोल रही थी, पता नहीं उसे सचमुच चढ गयी थी या फिर वह किसी खास मकसद के लिए मुंशीजी के सामने इस तरह का प्रदर्शन कर
रही थी, मुंशीजी कि समाजः में सिर्फ यही आया कि उन्होंने दो लार्ज पैग तैयार किये, एक डोली के हाथ में थमा दिया और दुसरे को खुद गटक गए. अब तक वे चार -चार पैग
हलक से नीचे उतार चुके थे. डोली की आँखों में लाल -लाल डोरे तैर रहे थे, प्राथमिक द्रष्टिकोण से ऐसा लगता था जैसे वह पीकर टुल्ल हो गयी हो . वह खुमारी में बोल रही थी-
- आज रात हम लोग सुहागरात मनाने वाले नहीं हैं क्या ? कल तो खूब मजा आया था ? क्या मैं सो जाऊं ?
मुंशीजी- हाँ, कल तो खूब मस्ती काटी थी मगर आज लगता है तुम बोर हो रही हो, मेरा साथ अच्छा नहीं लग रहा ?
डोली- कौन बोला ? ऐसा कौन बोला ? मैंने कहा क्या कि मजा नहीं आ रहा ?
मुन्शीजी - न अहिं कहा तो नहीं है मगर तुम्हारा व्यवहार कुछ ऐसा ही लग रहा है , शायद आज हम सुहागरात नहीं मना पायें .
डोली- लेकिन क्यों ? आपने तो कल वादा किया था कि अब हमारी हर रात सुहागरात होगी .
मुंशीजी- इस सबके लिए मोहब्बत चाहिए डोली, बिना मोहब्बत के सुहागरात नहीं मनाई जा सकती , और बिना होश के मोहब्बत नहीं की जा सकती .
Sunday, October 3, 2010
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