Tuesday, October 26, 2010

लवगुरु-७९
-क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा तो क्या होगा ?
रमन- कुछ नहीं मेरी जान, मैंने सब दरवाजे बंद कर दिये हैं. सिर्फ यही एक दरवाजा बचा है, इसे भी बंद कर दिया जाएगा.
मगर यहाँ आने वाला कौन है , और देखने वाला भी कौन है ? कोई रास्ता ही नहीं बचा है. तुम्हें शायद पता न हो मगर मैंने तुम्हें नग्न अवस्था में नहाते हुए कई बार देखा है . नहाने की बात छोड़ दीजिए मैंने
तो तुमको रंगरेलियां मनाते हुए भी देखा है, गलत मत समझो, तुम्हें और भैया को मौज मस्ती करते देखा है. एक दिन जब माँ और पिताजी खेत पर चले गए तो तुम दोनों ने समझा कि मैं भी उनके साथ चला गया हूँ
. तुम लोगों का अनुमान गलत भी तो नहीं था, उससे पहले मैं उनके साथ जाने ही वाला था , मगर अचानक मैंने प्लान बदल दिया . जिस कमरे में मैं था, उसकी किवाड़ भी इस ता
रह से घूमी हुई थी कि आप ,लोगों को मेरे जाने का भ्रम हो गया, और फिर इसके बाद आप लोग अपने काम क्रीडा के खेल में लग गए . मैं भी चुप पड़ा रहा. भैया बाहर का दरवाजा बंद कर आये थे और तुम्हें अपनी बांहों
में भरकर तुम्हारे होठों को चूमना शुरू कर दिया. कुछ देर बाद आप दोनों बिलकुल नग्न अवस्था में थी. मैं हरान रह गया . मेरी भावनाएं भडकने लगी थीं. मैं उत्तेजक हो था . जब मुझे कुछ नहीं सूझा तो मैंने अपने खास अंग को पकड़कर
हिलाना शुरू कर दिया, तुम्हारी आमोत्तेजक आवाज मुझे बेचैन कर रही थी, मैं कल्पना करने लगा कि काश तुम्हारे साथ मैं होता और देखता कि यह किस तरह का आनंद है . आह. मैं हस्तमैथुन करने लगा. जिस रफ़्तार में
तुम लोग चल रहे थे , उससे कई गुना ज्यादा रफ़्तार से मैं दौड रहा था. और जव वासना की आंधी बरसाअत में तब्दील हुई तब जाकर मुझे शान्ति हासिल हुई.
चम्पा- तुम झूठे हो, जब मैं बाहर निकलकर आई तो मैंने देखा कि तुम कमरे के नादर खर्राटे लेकर सो रहे थे .
रमन- यही तो गलतफहमी है तुम्हारी. तुम लोगों को लगा कि मैं सो रहा था , जबकि मैं आराम कर रहा था. बहाने बना रहा था. तुमसे कुछ पल पहले एहे दौडकर घर के अंदर आया था .
चम्पा- अगर तुम घर के अंदर थे तो अपना काम निबटाने के बाद निकल क्यों नहीं गए ?
रमन- क्योंकि तुम लोग यहाँ नंगे होकर ऐश ले रहे थे , अगर मैं दरवाजा खोलकर निकल जाता तो फिर बाहर से कोई भी आ सकता था.
चम्पा- अब एक बात करो, तुम चुपचाप निकल जाओ . वरना मैं बेवजह बदनाम हो जाउंगी .
रमन- मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा . मेरी प्यास भी बुझादों और अपनी प्यास भी बुझालो, देखो खुद कुआं ही तुम्हारे पास चलकर आया है. इसे अगर अस्वीकार करोगी तो बहुत पछताओगी .
चम्पा- जाओ, जितना बुरा करना है कार्लो, चम्पा किसीसे डरने वाली नहीं है . अब तक कौन सा अच्छा हुआ है , जों अब हो जाएगा .
रमन- इस जवानी का क्या आचार डालोगी ? मजा लेने के लिए है, लेलो वरना रस निचुडने के बाद कोई घास नहीं डालेगा.
चम्पा- जब तक जवानी का एहसास है, तब तक तो इतराने से कोई नहीं रोक सकता . तुम भी नहीं.
रमन- तुम तो ऐसे इतरा रही हो जैसे कि मेरे पास कभी ये चीज होगी ही नहीं. कल चाहूँ तो शादी करके नई हूर परी ले आऊं.
चम्पा- तो डराते किसको हो ? ले आओ न. मुझे क्या फर्क पड़ने वाला है. मुझे मजा देने वाला भी अभी ज़िंदा है. जब चाहूँ पति को शहर से बुलाकर मजे ले सकती हूँ.
रमन- लेकिन जब हम दोनों ही मजे ले सकते हैं तो इतनी अकड़ती क्यों हो ?
चम्पा- और तुम इतनी बात क्यों बनाते हो ? कोई आया तो लेने के देने पद जायेंगे .
रमन- ओह , मैं भी कितना नादाँ हूँ, तुम मेरे हाथों में हो , और मैं ऐसे ही फालतू की बातें करता चला जा रहा हूँ, शायद डर की वजह से ऐसा हो रहा है, मैं दहशत में हूँ .
चम्पा- अब जान पाए हो कि तुम कितने बड़े नादाँ हो ? जों प्रस्ताव तुमने आज रखा है, उसे पहले भी तो रख सकते थे.
रमन- मानता हूँ, मुझसे बहुत भूल हो चुकी हैं. कितने दिनों से तुम्हें अकेले ही रहना पद रहा है. मैं भी इस तन की भूख को मिटाने के लिए न जाने कहाँ -कहाँ मारा-मारा फिरता हूँ , अगर पहले से ही सद्बुद्धि आ गयी होती तो कम से कम ये
हाल तो नहीं होता, तुम भी जन्नत का मजा लेती और मैं भी रोजाना मस्ती के समुन्दर में गोते लगाता.
च्मपा- अब तक तो तुम अपना भतीजा खिला रहे होते. तुम्हारे भाई वैसे तो बहुत ताकतवर हैं मगर न जाने ऐसा क्या है कि बच्चा नहीं हो पा रहा है.
रमन- कोई बात नहीं, बीज बदलते ही फसल लहलहाने लगेगी . मुझे भरोसा है अपने आप पर .
चम्पा- मगर मुझे ज़रा भी विश्वाश नहीं है. अगर इसी तरह तुम वाकालत करते रहे तो बातों में ही वक्त गुजर जाएगा .
रमन- आई लव यू मेरी जान. आओ , अब बातें कम और काम ज्यादा करते हैं.

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