रेशायुक्त भोजन लेने के लिए हमें कुछ भी विशेष नहीं करना पड़ता, अपितु बहुत कुछ करने से बचना पड़ता है. रेशा प्रायः प्रत्येक प्राकृतिक खाद्य में उपस्थित होता है जिसे हम प्रायः भोजन की सफाई के बहाने निकाल कर दूर फैंक देते हैं. उदाहरण के लिए, आते को छान कर उसकी भुस्सी को दूर कर देते हैं जो वस्तुतः अनाज में प्राकृत रूप से उपस्थित रेशा होता है और उसकी हमारे भोजन में उपस्थिति अनिवार्य होती है. इसी प्रकार दालें दलकर उनके छिलके दूर कर हम प्राकृत रेशे से वंचित हो जाते हैं. कुछ दालों, जैसे अरहर, मूंग, उड़द, आदि का दलना उनके शीघ्र पकाने और पाचन में सहायक होता है किन्तु उनके छिलके हटाना हमारे लिए हानिकर सिद्ध होता है.
अधिकाँश रेशों में कुछ अपाच्य अवयव उपस्थित होते हैं जो भोजन को आँतों के अन्दर नरम तथा बिखरा हुआ बनाए रखते हैं जिससे हमारी आंतें उसके पोषक अवयवों का सरलता से अवशोषण कर लेती हैं और हमें भोजन का पूरा लाभ प्राप्त हो जाता है. यही रेशे अघुलनशील रेशे कहलाते हैं जो पाचन और पोषण में सहायक होते हैं.
दूसरी प्रकार के रेशे वसा में घुलनशील होते हैं जो वसा के साथ हमारे शरीर में समाहित हो जाते हैंऔर हमारी मांसपेशियों के निर्माण और उन्हें लचीला बनाये रखने में सहायक होते हैं. जई में ये घुलनशील रेशे पर्याप्त मात्रा में होते हैं जो शरीर को सशक्त बनाते हैं. वस्तुतः शरीर में वसा का प्रमुख उपयोग घुलनशील रेशों से मांसपेशियों का निर्माण करना ही होता है. रेशविहीन वसा शरीर में जमा होकर स्थूलता प्रदान करती है जिससे शरीर के परिचालन में मांसपेशियों पर अनावश्यक भार पड़ता है जिसे बचाने के लिए व्यक्ति आलसी हो जाता है और शारीरिक गतिविधियों के अभाव में भोजन का पाचन दुष्कर हो जाता है और वह अनावश्यक शक्कर में परिवर्तित होकर मधुमेह रोगको जन्म देता है.
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