लवगुरु-८2
रानी- मुझे भी अच्छा लगेगा तुम्हारी सेवायें पाकर . अगर केशव का जी करे तो वह अपने कपडे उतारकर अपनी इच्छा पूरी कर सकता है. अगर चम्पा को कोई ऐतराज नहीं है तो मुझे भला क्या ऐतराज हो
सकता है. जों खाने -पीने की चीज है, उसे खाना -पाना चाहिए और मुंज मस्ती वाला अवसर आये तो चूकना नहीं चाहिए.
चम्पा- केशव , सूना नहीं तुमने , मालकिन क्या कह रही हैं ? तुमने ही तो सिखाया था कि मालिक का हर आदेश भगवान के आदेश की तरह होना चाहिए . मालकिन तुमसे कुछ कह रही हैं और तुम हो कि
मिट्टी का बुत बने बैठे हो . मेरे करीब आ जाओ. मैं खुद तुम्हें मालकिन के बिलकुल करीब ले जाउंगी .
केशव- ये तुम कह रही हो चंपा ? इसका मतलब जानती हो ? कल को मुझे तो नहीं दोगी . देखो , मैं जों कुछ करूँगा वह तुम्हारे कहने की वजह से करूँगा . अगर कभी इस बात का ताना दिया तो मुझसे बुरा नहीं होगा.
चम्पा- बेफिक्र रहो, मैं कभी कुछ नहीं कहूंगी. मगर मालकिन के आदेश की अवहेलना नहीं होनी चाहिए . ये जैसा कहती हैं, वैसा करते रहो. मेडम के जिस्म की मालिस करो. मेरा करना अलग है, तुम्हारा अलग . क्योंकि
मेरे हाथ काफी मुलायम हैं और तुम्हारे सख्त. इसलिए इन हाथों से इन्हें ज्यादा आनंद आएगा.
रानी- हाँ केशव, चम्पा ठीक कहती है. तुम इसके साथ मिलकर मालिस करो, देखूं कितनी ताकत है तुम्हारे हाथों में ? और सुनो, तुम मेरे पैरों की तरफ मुंह करके लेट जाओ, समझ रही हो न चम्पा. तब देखना कैसा
आनंद आता है ? आज तुम लोगों के साथ जी भरके मौज मस्ती करनी है.
चम्पा बहुत उत्साहित थी, उसने रानी के आदेश का तुरंत पालन किया. अब चम्पा का यौवंद्वार रानी के बिलकुल करीब था. चम्पा ने उसके द्वार की तरफ अपनी उँगलियाँ बढानी शुरू करदी. पहले उसने एक उंगली
प्रवेश की और उसे जादुई तरीके से घुमाने लगी. पहली बार चम्पा को कुछ हरकत सी महसूस हुई . इसके बाद जब रानी ने दूसरे उंगली भी डाली तो चम्पा सिस्कारियां भरने लगीं, केशव होशियार था,. फ़ौरन इशारा
समझ गया और रानी के यौवन द्वार पर अपनी हथेली घुमाने लगा. कुछ देर तक यही क्रिया दोहराता रहा और फिर उसने अपनी दो उँगलियाँ यौवन द्वार में घुसा डालीं. इस बार रानी के मुंह से भी सिसकारी निकल गयी .
रानी ने हाथ बढ़ाकर टेबल पर रखा अपना शराब का गिलास उठाया और चम्पा को तुरंत तीन लार्ज पैग बनाने के आदेश दिए. चम्पा वहाँ से उठकर आदेश का पालन करने लगी. एक बार फिर तीनों के हाथ में जाम
थे. तीनों ने पैग खत्म कर अपनी पहले जैसी पोजीशन संभाल ली. अब चम्पा तो केशव के खास हथियार को सहला रही थी , रानी की उँगलियाँ चम्पा के प्रवेश द्वार में थीं और केशव की उँगलियाँ भी रानी के यौवन द्वार
में हरकत कर रही थी, धीरे -धीरे उँगलियों की संख्या बढ़ती गयी और तीनों काम वासना के आगोश में आते रहे . केशव ने पूछा-
- सब लोग खामोशी के साथ मजा ले रहे हैं, बड़ा अजीब लग रहा है. जब तक कुछ बातचीत नहीं की जाए तब तक आनंद नहीं आता . चलो , मैं ही शुरुआत अकर्ता हूँ. आप दोनों को कैसा महसूस हो रहा है ?पूछने का
कारण सिर्फ इतना सा है कि अगर यह अच्छा नहीं लगा हो तो मैं दूसरे स्टायल का प्रयोग करू ?
रानी- अरे नहीं यार , तू जैसा कर रहा है, ऐसे ही करता रह. जन्नत जैसा आनंद आ रहा है. अगर पूछना है तो चम्पा से पूछ ले.
चम्पा- मैं तो इतनी खुश हूँ कि बता नहीं सकती , बहुत ज्यादा मजा आ रहा है.
केशव- आप दोनों में से किसीको अपने बचपन की याद आयी कि नहीं ? बचपन में भी तो इस तरह का सुख किसी सहेले के साथ लिया होगा ?
रानी- बचपन की छोडो , हम तो अब भी कोई मौक़ा नहीं छोड़ते , जब भी अवसर मिलता है, चौका मार देते हैं. तुम अपनी कहो, तुमने दोस्तों के साथ कुछ नहीं किया ?
केशव-झूठ नहीं बोलूंगा, मैंने तो खूब मजे लिए हैं. हम कई दोस्त थे और एक दुसरे के संवेदनशील अंग के साथ खूब छेडछाड किया करते थे .
चम्पा- अरे वाह , पहले तो कभी यह बात बताई . चलो देर आये दुरुस्त आये . ज़रा विस्तार से बताओ तो मजा आये.
केशव - हम लोग अकी दोस्त थे. दोपहर के समय कह्तों में जाते थे और किसी फसल वाले खेत में बैठकर बीडी के खूब सुट्टे लगाते थे. पैसे नहीं होते तो ठोंठा बीन लाते थे .
रानी - ये ठों ठा क्या बला है ?
केशव - जब लोग बीडी पीने के बाद बचे हुए टुकड़े को फेंक दिया करते थे, तो उसको हम लोग उठा लेते थे,. समझ गयीं ठोंठा ?
रानी- हाँ, समझा . अब आगे बढ़ो, खेत में जाकर सुट्टा लगाते थे , और क्या -क्या गुल खिलाते थे ?
केशव- मैं अपने दोस्त के संवेदनशील अंग को सहलाता था और मेरा दोस्त मेरे खास अंग से खेलता था, यह सिलसिला तब तक चलता था , जब तक कि तन की वासना शांत न हो जाए .
रानी- क्या ऐसे जिस्मानी सुख मिल जाता ठा ?
केशव- क्या पूछोगी , बड़ा मजा आता था, और कोई साधन भी नहीं था. हम लोगों में ऐसी दोस्ती होती थी कि अगर किसी एक ने भी कोई लड़की पटाली तो अबकी के सब लोग उसके साथ कामक्रीड़ा का सुख भोगते थे
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