दीपू- जब कुछ नहीं करता तब भी तुम्हारे प्राण निकल रहे होते हैं और जब कर रहा होता हूँ तुम जब भी चिल्लाती रहती हूँ आख़िर यह सब क्या है , मोहब्बत की कश्ती में सवार होकर अगर चाहने वालों को इस तरह सताओगे तो कैसे काम चलेगा... हम ठहरे इश्क के पुजारी ,, हमें रोक -टोक भला कैसे पसंद आएगी... हम प्यार की खातिर सिरभी कटाने वालों की जमात में शामिल हो चुके हैं...
शैली- वाह, तुम्हारी बुलंद आवाज सच्चाई की प्रतीक है... मैं जानती हूँ तुम मुझे प्यार करने लगे हो, मैं भी चाहने लगी हूँ तुम्हें... लेकिन डर लगता है की कहीं कोई अनहोनी न हो जाए...मुझे बहुत ठोकरें मिली हैं दीपू, बड़ी मुश्किल से जिन्दगी में थोडा सा स्थायित्व आया है... अब मैं खुश हूँ , सुखी हूँ... मेरी दुनिया चाहे जैसी हो मगर मैं यहाँ संतुष्ट हूँ... इसे छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहती... मेरी कोशिश ये है की किसी तरह से मेहनत मशक्कत करने के बाद इतने पैसे जमा करलूं की आराम से यह जीवन बसर हो जाए...
दीपू- इतना हल्का मन क्यों करती हो शैली... जरूरी नहीं की हर इंसान एक जैसा ही हो... यहाँ ग़लत और अच्छे हर तरह के लोग रहते हैं... मुझ पर भरोसा करके तपो देखो, अगर फ़िर तुम्हें लगता है की तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है तो अपनी दुनिया में वापस लौट आना... कौन रोकेगा तुम्हें ? और कैसे रोक पायेगा ?
शैली- दिल टूट जाता है तो जीना मुश्किल हो जाता है यार... अगर फ़िर से धोखा हुआ तो जी नहीं पाउंगी... तुम नहीं समझते , नारी का ह्रदय कितना कोमल होता है... मैं बहुत भावुक हूँ .... मैं किसको को तकलीफ देना भी नहीं चाहती औए तकलीफ लेना भी नहीं पसंद... अगर कोई मुझे धोखा देता है तो मेरा खून खुल उठता है...
दीपू- हाँ, तकलीफ तो होती ही है, सबको होती है... मगर क्या किया जा सकता है... मरा भी तो नहीं जाता ...
शैली- मरने का सवाल कहाँ आता है.... ख़ुद ही तकलीफ उठाओ और ख़ुद ही मरो भी... यह कहाँ का न्याय है , कहाँ का क़ानून है , और अगर कहींका होगा भी तो ग़लत है ... इसे बदलना होगा....मुझे यह मंजूर नहीं...
दीपू- मगर किया भी क्या जा सकता है... मेरा मतलब है की अगर कोई मर्द तुम्हारी इज्जत के साथ खिलवाड़ करे तो ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकती हो... पुलिस में रिपोर्ट करने जाओगी तो उसे खरीदना ज्या दा बड़ी बात नहीं है ... केस चला भी तो चलता ही रहता है ... ताकतवर इंसान का तुम जैसी नाजुक लड़की बिगाड़ भी क्या सकती है ?कहते हैं की धींगरा का रास्ता सिर पर होकर रहता है...
शैली- मैं ऐसा नहीं मानती... और भी कई रास्ते हैं... उस ताकतवर सितमगर को मारा भी तो जा सकता है ...
दीपू- मगर कैसे ? ह्त्या कैसे की जा सकती है ?
शैली- क्यों नहीं की जा सकती ? जब इंसान करने पर आए तो कुछ भी कर सकता है... मैं ख़ुद इस बात की गवाह हूँ... अपने इन्हीं हाथों से मैंने अपने प्रेमी राजेश को मौत के घाट उतारा था...
दीपू- ये क क क्या कह रही हो शैली ? ऐसा हो ही नहीं सकता ... शेखी बघारने के लिए तुम ऐसा कह रही हो...
शैली- यकीन नहीं आता न... मैंने यह राज आज तक किसीको नहीं बताया ... तुम्हें बताया भी तो तुम यकीन नहीं कर रहे हो...
दीपू- कैसे मानूंगा मैं ? मुझे इस बात का यकीन क्यों करना चाहिए ?
Saturday, May 30, 2009
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