Friday, May 15, 2009

तड़प, भाग-34

मैं अपनी तरफ़ से कोई कमी नहीं छोडूंगा.... तुम्हें स्वर्ग जैसा सुख देने की हर सम्भव कोशिश करता रहूँगा... पहले तुम हवेली पर आओ, रात भर भर वहीं ठहरो फ़िर देखना कमाल...
शैली- बहुत मुश्किल होता है घर से बाहर रात गुजारना... मुझे लगता है मम्मी -पापा को सब भनक लग चुकी है, इसी कारण मैं उनके सामने झिझकती रहती हूँ, मन में ग्लानी सी रहती है...
राजेश- ये सब तुम्हारा वहम है, ऐसा कुछ नहीं होता... दोस्ती और मोहब्बत की बात वो भी समझते हैं... वो भी जानते हैं की इश्क क्या होता है, अगर ऐसे ही छिछोरेपन की बात होती तो वे तुम्हें जरूर टोकते...
शैली- माँ वृद्ध होने को आयीं, बीमारी ने समय से पहले ही उन्हें बुढापे की तरफ़ धकेल दिया है... अब तो काम भी नही होता... मैं उनका हाथ नहीं बँटा सकती, इसका मलाल होता है...
राजेश- तुम्हें फ़िक्र करने की जरूरत नहीं है... हमारी हजारों एकड़ खेती किस दिन काम आएगी, तुम अपने पिताजी से कहना की की हमारी नहर के किनारे वाली १० बीघा भूमि को जोतने लगें, अच्छी फसल देती है, उसीसे तुम्हारे घर के सारे खर्चे निकलते रहेंगे...
शैली- इस बारे में उनसे क्या कहूँगी ? कोई भी इतनी जमीन ऐसे ही कैसे देने को राजी हो जाएगा ? यहाँ तक की लेने वाला भी हजार बार सोचेगा ... उनके मन में ग़लत ख़याल आ सकते हैं...
राजेश- ऐसी बात नहीं है, हमारे खानदान के बारे में हर कोई जानता है... सबको मालूम है की हम अपने शुभचिंतकों में ऐसे जमीन बाँटते रहते हैं...
शैली- तुम कह भी दो तो क्या होता है , जमीन तो तुम्हारे पिताजी के नाम होगी?
राजेश- नहीं, सारी जमीन अलग-अलग लोगों के नाम है, मेरी बात कोई नहीं गिराएगा, जो भी कह दिया वह पत्थर की लकीरहै...कोई उसे काटने वाला नहीं है...
शैली- ठीक है तो किसी दिन अच्छा सा मुहूर्त देखकर उसे पहले पिताजी के नाम लिखवा दीजिये वरना तुम्हारे खानदान के लोग बाद में झगडा करेंगे ...
राजेश- नहीं ऐसा कोई नहीं कर सकता , फ़िर भी अगर तुम्हारे मन में कोई संशय है तो कोई दिक्कत नहीं, सोमवार को तुम मेरे साथ चलना , तुम्हारे ही नाम लिखवा दूंगा... फ़िर तुम्हारा ये रोजाना का खर्चों का झंझट मिट जाएगा...
शैली- ठीक है, मैं पिताजी को समझा बुझाकर आती हूँ... लेकिन यह बात लीक नहीं होनी चाहिए...
राजेश- पागल हुई हो क्या ? इस तरह की बातें लीक करने के लिए होती हैं क्या ?
इसके बाद जब राजेश अपने शहरी दोस्त रवि को लेकर उसके घर से निकला तो शैली को कुछ खटका सा लगा... उसको रवि की नीयत कुछ अच्छी नहीं लग रही थी..., रवि का ध्यान शैली के उफनते हुए यौवन पर टिका हुआ था... जब वह साँस लेती तो उसके सीने के वक्ष ऊपर नीचे होने लगते थे और रवि की दिलचस्पी उसी में ज्यादा थी...


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