Wednesday, May 6, 2009

तड़प, भाग-25

यह ठीक नहीं रहता , तुम्हें भी तकलीफ हो सकती है और मुझे भी... अगर सचमुच तुम मुझसे प्रेम करने लगे हो तो फ़िर एक काम करो, आज के लिए मुझे घर जाने दो... ठीक होते ही हम एक बार फ़िर अकेले में मिलेंगे...
राजेश- तुम तो ऐसी बात कर रही हो जैसे की मैंने तुम्हें बांधकर रखा है, अगर तुम सचमुच जाना चाहती हो तो जा सकती हो, मैं रोकने वाला कौन होता हूँ....लेकिन एक बात का ध्यान रखना, तुम मेरा दिल दुखाकर जा रही हो, मेरे अरमान जलाकर जा रही हो, अब मैं रात भर सो नहीं जाऊँगा... पेट भरके खा नहीं पाऊंगा, चैन से जी नहीं पाऊंगा...
शैली- इतने भावुक और कमजोर मत बनो... दिल को मजबूत बनाओ ...
राजेश- गला काटकर फ़िर मरहम लगाने की बात करती हो, तुम हसीनों की इस आदत से मैं अच्छी तरह वाकिफ हूँ...मैं तो तुमसे सच्चा प्यार करता हूँ...अगर कोई शक है तो मेरी परिक्षा ले सकती हो...
शैली- मैं अगर तुम पर संदेह करती तो यूँ दिल न्यौछावर नहीं करती... ऐसे अकेले में तुम्हारे साथ नहीं आती... जब भरोसा होता है तभी कोई इतना रिस्क लेता है...
राजेश- अब मैं इससे ज्यादा कोई सफाई नहीं दे सकता , इतना ही कहता हूँ की ऐसे
शैली- तुम्हें ऐसा क्यों लगता है की मैं जानबूझकर यहाँ से जाना चाहती हूँ, तुम जैसे खूबसूरत और जवान मर्द
हर किसीको नहीं मिलते... तुम बेहद सुंदर और सुलझे हुए हो, मैं तुमसे बार- बार और हर बार मिलना चाहूंगी...
राजेश- अच्छा ठीक है , भरोसा है मुझे तुम पर... अब तुम जा सकती हो...
दीपू और शैली गार्डन के छिपे हुए कोने में बैठकर यह चर्चा कर रहे थे... शैली अपने जीवन की बीती हुई कहानी उसे बाता रही थी... दीपू ध्यानपूर्वक सुन रहा था...वह पूछने लगा-
- अच्छा ये तो कहो की उस समय तुम इतनी होशियार कैसे थीं ? मुझे लगता है की तुमने राजेश से झूठ बोलकर उससे आसानी से पीछा छुडा लिया वरना मेरे ख़याल से वह उस दिन तुम्हें छोड़ने वाला नहीं था...जब तुम कह रही हो की वह इतना बड़ा दबंग था तो उसका जलवा होगा गाँव में , कोई उसका क्या कर लेता ? ऐसे लोग सनकी भी होते हैं, अगर उनकी नहीं मानो तो अपराध करने पर भी उतर आते हैं...
शैली- हाँ, सही पहचाना, उस दिन मैंने झूठी क़समें खाईं और क्झूथ के सहारे बचकर चली आयी... मैंने ये सारी कहानी अपनी एक खास सहेली को बतायी तो वह मुझे समझाने लगी...
दीपू- क्या कहा उसने ? क्या वह राजेश से दोस्ती करने के पक्ष में थी ? याफिर वह मना कर रही थी ?
शैली- दरअसल वह थाकुन के जुल्मों को अच्छी तरह से जानती थी , उसकी राय थी की मैं यह बात किसीसे न कहूं और चुपचाप गाँव छोड़कर किसी रिश्तेदारी में दूर चली जाऊं, क्योंकि अगर राजेश कुछ चाह लेता है तो ख़ुद उसके घरवाले भी उसकी इच्छा पूरी करने में जुट जाते हैं , चाहे उन्हें जोर जबरदस्ती ही क्यों न करनी पड़े ?
दीपू- हैरत होती है ऐसी बातें सुनकर , क्या अब भी ऐसी यातना देने वाले लोग यहाँ जिन्दा हैं?

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