Monday, May 4, 2009

तड़प, भाग-23

राजेश के घर में इस वक्त उन दोनों के सिवाय और कोई मौजूद नहीं था...अकेले में उन दोनों के जिस्म एक दूसरे से सटे हुए थे...इससे उनके बदन बुरी तरह तपने लगे... शैली का कुंवारा बदन आग में झुलस रहा था... अब उसकी इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी की वह राजेश से मना कर सके... चुपचाप अआहें भरने में व्यस्त शैली का ध्यान तब टूटा जब राजेश ने कहा-
- तुम मेरे लिए बनी हो शैली... इस मद मस्त जवानी को मेरे नाम करदो, फ़िर देखो जन्नत के सुख कैसे मिलते हैं...
शैली- और किसीके नाम करनी होती तो इस तरह तुम्हारे पहलू में क्यों आती ? अब तो तुम्हारी हो ही गयी...
राजेश- देखो, ऐसा ना हो की बाद में बात बदल जाओ... दिल मुझे दिया है तो हमेशा प्यार भी मुझसे ही करना पड़ेगा... मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अपनी हवस मिटाने के बाद पहचानने से भी इनकार कर देते हैं...मैं ठहरा प्यार का पुजारी... सिर्फ़ प्रेम करना जानता हूँ...
शैली- तुमने स्कूल में देखा होगा , मैं किसी से बात भी करती हूँ क्या ? किसीकी तरफ़ देखती बही नहीं हूँ... एक तुम ही हो जिसके लिए मैं यहाँ तक आ गयी... तुम्हारी हवेली में तो कितनी ही लड़कियां आती हैं, तुम्हें मौज मस्ती की क्या कमी होगी ? मुझे सब मालूम है...
राजेश- अच्छा, ऐसी बात है... तुम्ही बताओ मेरा नाम कभी लफडे में सुना है... भले ही हमारी हवेली में कितनी ही लड़कियां आती हैं, एक से बढ़कर एक औरतें हमारे यहाँ काम करती हैं मगर मुझे तुम्हारे जैसी कोई नहीं लगती...
शैली-तुम्हारे बड़े भाए तो खूब रंगीले हैं, उनके पूरे गाँव में चर्चे हैं... कोई ऐसी औरत नहीं होगी जोतुम्हारी हवेली में आती हो और फ़िर सूखी लौट जाती हो... यहाँ आने वाली ऐसी किसी लड़की नाम बताओ जिसकी इज्जत महफूज हो... बता सकते हो कोई नाम ?
राजेश- तुम मेरे बड़े भाई की बात कर रही हो, उसकी तुल्लना मुझसे नहीं की जा सकती... वह तो रसिया है , रंगीला रतन है... गुलछर्रे उडाना उसका शौक है, मगर तुम मेरे बारे में कोई भी एक ऐसी बात बतादो... भले ही हमारे पास दौलत है, सैकडों बीघा खेत है मगर मैं उसका घमंड नहीं करता...
शैली- तुम्हारे पुरखे राजा महाराजा थे, उनका ही खून तुम्हारी रगों में भी दौड़ रहा है... मुझे नहीं लगता तुम भी उनसे कुछ अलग होंगे...
राजेश - मुझ पर भरोसा करने का कारण बी ही तो नहीं है तुम्हारे पास... कोई एक शिकायत तो कहो...
शैली- दूसरे किसी का क्या कहना ... मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूँ... छोड़ने का बोलती हूँ तो और भी जकड लेते हो...मुझे छोडो तो जानूं... मैं इस वक्त अपने घर जाना चाहती हूँ...
राजेश- मजाक कर रही हो, ऐसे हसीं पलों को तुम कैसे छोड़ना चाहोगी ? जरूर तुम झूठ बोल रही हो...
शैली- नहीं , बिल्कुल नहीं.... मैं सच कह रही हूँ, मेरा दम घुट रहा है... अभी- अभी मुझे महिना आ गया है... अब मैं तुम्हारे किसी काम की नही रही.... समझे बुद्धू.... अब कम से कम चार दिन इन्तजार करो...
राजेश - मेरे ऊपर इतना जुल्म मत करो.... अरे मर जाऊँगा मैं... मुझे तुम्हारी इस समय सख्त जरूरत है....
राजेश के शब्दों में याचना थी... उसने महसूस किया की राजेश उत्तेजना के चरम पर पहुच गया था....









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