शैली जब काफी देर तक राजेश के ही विचारों में ही गुमरही तो दीपू को टोकना पड़ा-
- कहाँ हो ? मैं तुम्हारे पहलू में हूँ और तुम्हारा कहीं अता -पता ही नहीं है... क्या बात है मेरी जान ?
शैली- कुछ पुरानी बातें याद आ गईं, मन बहक गया , जख्म थोड़े से हरे हो गए... इसीलिए तो मैं चुप रहती हूँ...
दीपू-इस चुप्पी को तोड़ डालो , दिल में जो दर्द है उसे बाहर निकालो वरना ये naasoor बन जाएगा,,,
शैली- मैं जब छोटी थी तो मेरे साथ बलात्कार किया गया... जब उसकी शिकायत पुलिस से करनी चाही तो उलटी तोहमतें सहनी पड़ीं, धमकियाँ मिलीं... घरवाले डर गए, गाँव के दबंग लोगों ने उन्हें खूब डांटा -डपटा... आखिरकार चुप ही रहना पड़ा... मैं पढने जाती तो सहपाठी छेड़ते थे, ताने देते थे... जब बड़ी हुई तो राजेश नाम के एक लड़के ने मुझसे प्यार का इजहार किया... पहले-पहले तो मैं नजरअंदाज करती गयी मगर फ़िर जल्द ही मैंने महसूस किया की राजेश मुझे दीवानों की तरह चाहने लगा था, वह मेरा खूब आदर भी करता था... मैं उससे मिलने लगी... यह मुलाक़ात बहुत कम समय के लिए होती थी... कभी गली के किसी नुक्कड़ पर हम एक दूसरे से राजी खुशी पूछ लिया करते थे...
Saturday, May 2, 2009
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