Monday, November 22, 2010

लवगुरु-१०४
बिजली- तुम्हारे रहते हुए मुझे इस बात का क्या फर्क पड़ता है , तुम तो मेरी जान हो.
केशव- तुम शहर की गोरियाँ बड़ी सेक्सी और मतलबी होती हैं. ऐसा लोग कहते हैं.
बिजली- लोगों का क्या है , लोगों का काम है कहना, मुझे बस तुम्हारी चिंता है. कल से तुम्हारी सेहत पर भी ध्यान दूंगी,. जों रसोइया है उसे समजह दूंगी कि तुम्हें खाने में हर वो चीज मिलनी चाहिए जों तुम्हें
शक्तिवान बनाती हो. अगर ताकत ही नहीं रहेगी तो मुझे मजा कैसे दे पाओगे ?
केशव- इस सबका एहसान मैं कैसे चुका पाउँगा ?
बिजली- अच्छा , अब ऎसी बातें करोगे ? यही सब रह गया है क्या ?
केशव- कहीं हम पुराने जन्म के प्रेमी तो नहीं ? कभी फिल्मों की तरह बिछुड गए हों, और इस जन्म में मिल गए हों..देखा होगा तुमने फिल्मों में ऐसा होता है. मैं तो ऐसे उपन्यास बहुत पढ़ता रहता हूँ. ऐसे रोमांटिक और जासूसी उपन्यास
पढ़ना मुझे बहुत पसंद हैं. मुझे ही क्या और भी लोगों को अच्छा लगता है.
बिजली- हाँ केशव, सच कहते हो. इस तरह की कहानियाँ दिल को छू जाती हैं. लेकिन हम लोग तो इन् कहानियों को असल जिंदगी में आजमा रहे हैं. जैसा प्यार किसी फिल्म या कथा में भी नहीं होता होगा जैसा कि हम लोग कर रहे हैं.
केशव- हाँ, कभी-कभी तो सपनों जैसा लगता है. ऐसा महसूस होता है कि मैं किसी जादुई नगरी में आ गया हूँ और कुछ देर के बाद जब आँख खुलेगी तो सब कुछ पुराने जैसा ही हो जाएगा . ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं अभावों में पला
बढ़ा हूँ, जहां सिर्फ अभावों की ही बातें थीं, निराशा थी, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार ठा. वहाँ से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं दिखाई देता था. वो तो ये है कि अचानक तुम लोग मिल गए और मैं इतने ठाट -बात से रहने लगा. आप
लोग तो लंबी चौड़ी सुविधाएँ देने के बात करते हैं मगर हम तो सिर्फ रोटी तक के लिए मोहताज थे. हमने आपके जैसे ऊंचे महलों के खाब नहीं देखे थे , इतना भर ही सोचा था कि बस एक झोपडा अपना हो , जिसमे रात को बच्चे सिर
छिपा सकें. मगर कुदरत की लीला तो वाकई निराली है. जैसे कहानियों में होता है वैसे ही आप हमको मिल गयी , अब ये पता नहीं कि यह रिश्ता कितने दिनों तक टिक पाता है. क्योंकि मेरे दिल के अंदर से ये आवाज आती है कि जरूर
एक दिन रानी मेमसाब को यह बात पता लग ही जायेगी कि मैं और तुम इश्क फरमाते हैं, और यह भी कि हम दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ते कायम हो गए हैं. तो यह सुनते ही वे आग बबूला हो जायेंगी .
भले ही वे कुछ भी करती सही मगर जब उनको इस राज के बारे में पता चला तो दोनों पर गाज गिरनी जरूरी है. उसी दिन से हमारे सुख भरे दिन फिर से दिउखों में तब्दील हो जायेंगे .
बिजली- मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी केशव, तुम इत्मीनान क्यों नहीं रखते , अव्वल तो मोम ज्यादा चूं -चपड़ करेंगी नहीं और अगर जयादा कुछ बोलीं तो फिर मैं उनको बख्शने वाली नहीं हूँ.
केशव- वो स्थिति भी तो ठीक नहीं होती है , क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आप अपनी मा के सामने उल्टी बातें करें. औलाद को कभी भी माता-पिता का अपमान नहीं करना चाहिए.
बिजली- तुम ठीक कहते हो. माँ-बाप के क़दमों में स्वर्ग होता है , मगर जब मजबूरी हो तो क्या किया जाए ?
केशव- जीवन में माँ-बाप एक बार ही मिलते हैं. वे भगवान का रूप होते हैं.
बिजली- मैं सिर्फ अपना बचाव करूंगी.
केशव- क्या कोइया ऐसा उपाय नहीं है कि आपके और आपकी माँ के बीच कोई तकरार भी न हो और हमारा प्यार भी परवान चढता रहे .
बिजली- तब तो तुम ही कोई राह निकाल सकते हो. सोचो क्या हो सकता है ? जब तुम इतना सोच चुके हो तो आगे का भी सोच ही सकते हो .
केशव- हाँ, हाँ क्यों नहीं ? मैं बात कर सकता हूँ. मैं मेमसाब से इतना तो कह ही सकता हूँ कि जब वे काम क्रीडा के इस खेल में मेरे भाई और पत्नी को शामिल कर रही हैं तो बिजली को भी शामिल किया जाए. भले
ही उस वक्त पर तुम किसी के साथ सेक्स मत करना. मगर एक रास्ता तो ओपन हो ही जाएगा , बाद में हम दोनों छिप-छिपकर ऐश किया करेंगे .
बिजली- वे इतनी नादाँ नहीं है केशव, आज जब मैंने दर्द की बात कहकर तुम्हारे साथ रहने को कहा है तो वे समझ ही गयी होंगी कि मेरी काम वासना भी भड़क चुकी है.
केशव- और इस कामवासना को शांत करने के लिए उन्होंने मुझ जैसे गंवार को चुना है , यही कहना चाहती हो तुम ?
बिजली- कौन कहता है तुम गंवार हो, अरे तुम तो मेरे सपने के राजकुमार हो. मेरा जब विवाह होगा तब होगा, आज के पति तो तुम ही हो ना. अगर आज तुम साथ नहीं देते तो मैं टूटकर
बिखर जाती. मैं कोई गलत रास्ता चुन सकती थी. अब कोई दिक्कत नहीं है हम दोनों अपनी इच्छा से सुरक्षित सेक्स को चुन रहे हैं.
केशव- हाँ, और दोनों ही वयस्क हैं. आपको भी कसी तरह की कोई तकलीफ नहीं होगी साथ ही कोई बाहर का इंसान भी यह जान नहीं पायेगा कि हमारे बीच किसी खिचड़ी पाक रही है.
बिजली- तुम मेरी प्यास बुझाते रहो. बाकी किसीकी फ़िक्र मैं नहीं करती.

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