लवगुरु-१०६
,और मैंने जों भी किया वह आपके कहने पर ही तो किया. मगर अब तो मेरे पास कहने के लिए यह रास्ता भी नहीं बचा है.
रमन- हाँ, ये बात सही है. क्योंकि उनके सामने मैं तो इनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाता नहीं, और अगर ऐसा करता तो उनके बार-बार आग्रह करने पर ही करता , उस समय मेरे पास भी कहने के लिए बहुत कुछ होता.
रानी - मौज मस्ती के समय में तुम लोग भी क्या रोना लेकर बैठे हो . मेरे गालों की चर्चा करो , और करना ही है तो मेरी कातिल अदाओं की बात करो ..
चम्पा- हाँ, शायद हमें ऐसा ही करना होगा.
केशव- मैं तो जीवन भर आपकी इस मनमोहक मुस्कान की बात करना चाहता हूँ. आपके यौवन सागर में सदा डुबकियां लगाना चाहता हूँ मगर ऐसी किस्मत भला है कहाँ ?
रानी - क्यों ? ऐसी हारी -थकी बात क्यों करते हो ? मैं अपनी जवानी तुम दोनों भाइयों के नाम करती हूँ. सदा-सदा के लिए.
बिजली- अच्छा जी, मेरे लिए आप कुछ बचाकर नहीं रखेंगी ?इनके नाम ही अगर जवानी कर डालेंगी तो हम जैसे चाहने वालों का क्या होगा ?
रानी-तुम मुझसे अलग कहाँ हो ? मैंने तुम्हें भी अपने साथ ही जोड़ लिया ठा. जब तुम नहीं तो हम नहीं. तुम जैसी सहेली जल्दी से नहीं मिलती. विचारों का मिलन आसान नहीं है. मेरे और तुम्हारे विचार एक जैसे मिल गए ,
यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है. तुम्हारे जैसी जवान और समझदार दोस्त भला आसानी से कहाँ मिलती हैं ?
रमन- मैं ऐसा महसूस करने लगा हूँ कि इस समय बदन वासना के ज्वालामुखी में जल रहा है. अब इस गर्मी को शांत करना जरूरी हो गया है.
रानी- फ़िक्र की बात क्यों करता है रे रमन, तेरे पास तो महज एक ही ज्वालामुखी है जबकि हमारे पास दो-दो समुन्दर है. चाहे जहां से शुरुआत कर. मैं चाहूंगी कि पहले चम्पा को ही खुश करदे.
रमन- जैसी आपकी आज्ञा , मगर इस बीच जब आप कामोत्तेजित हो गयी तब क्या करोगी ? मैं केशव भाई के जैसा स्ट्रोंग तो नहीं बन सकता न . मैं तो बस एक बार में एक को ही सुख संतुष्टि दे सकता हूँ.
चम्पा- तो बनो न अपने भाई के जैसा, क्या फर्क पड़ता है ? नहीं बनोगी तो इस जवानी का क्या करोगी ? इसका अचार थोड़े ही बनता है ?
रानी- चम्पा ठीक ही तो कहती है. सब कुछ कोशिश करने से ही होता है. पैग मारने के बाद अतिरिक्त शक्ति आ ही जाती है.
चम्पा- चलो आज से ही प्रयास करो, पहले मैडम जी की प्यास बुझाओ . मुझे तो तुमसे ज्यादा ये ही संतुष्ट कर देती हैं, खूब मजा देती हैं.
रानी- मुझे भी तो सुख मिलता है, तुझे सुख देने की बाद.
फिल्म चल रही और उनकी बेड पार्टनर को अच्छा खासा आनंद मिल रहा ठा. तभी कुछ अवरोध हुआ तो रानी ने रिमोट के सहारा लेकर उसे दुरुस्त कर दिया. चम्पा ने सिगरेट सुलगाकर रानी को दे दी थी , वह धुंए
के छल्ले लगातार उडाती जा रही थी. साथ ही एक हाथ से वह रमन के कड़क अंग को भी सहला रही थी. चम्पा भी खामोश नहीं बैठी थी , वह रानी के गुप्तांग को चूम रही थी. इस स्पर्श का ही असर था कि रानी
उतीजित होकर काम वासना के शिखर पर पहुँच गयी . रमन आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ा , चम्पा ने सहयोग करके रानी के यौवन द्वार पर उस काले नाग को रख दिया . रानी चीख पडी. इस चीख को रमन अपनी जीत
मानकर चल रहा था मगर इसमें चम्पा का भी काफी योगदान ठा , उसने रमन के अंग के साथ -साथ अपनी दो उँगलियाँ भी प्रवेश कर दी थीं. रमन पूछ रहा था-
-कहीं तकलीफ तो नहीं हो रही हैं ? निकालूँ क्या मैडम ?
रमन- नहीं, नहीं. मजा आ राह है . आहिस्ता-आहिस्ता करो. बहुत आनंद आ रहा है.
चम्पा- मुझे भी उतना ही सुख मिलने लगा है. बेहद उसख का समय है.
रमन- मैं तो जैसे स्वर्ग की सैर करने लगा हूँ. हवा में उड़ने लगा हूँ. कल्पना के एक ऐसे लोक में जहाँ खुशियों के सिवाय और कुछ नहीं है.
चम्पा- अगर इस आनंद को और ज्यादा बढ़ाना चाहते हो तो ऐसा करो, इधर , नीचे की तरफ मुझे भी खुजली होने लगी है. समझ गए न...
रानी- हाँ, ये ले... मैं हूँ न तेरे लिए. आह.....
चम्पा- एक साथ नहीं,,,, एक -एक करके ....
रमन- अभी तो मरी जा रही थीं, अब इतने जल्दी आह-ऊह करने लगीं. थोड़ी देर रुको तो सही.
चम्पा- जिसकी जान से बीतती है, वही जानता है. आप मर्दों को इसका एहसास भला कहाँ होता है ? कुछ जोर नहीं पड़ता न, इसलिए ऐसा करते हो.
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