Wednesday, November 10, 2010

लवगुरु-९३
केशव- ठीक है. मगर यह जरूरी तो नहीं की आज ही हमारे प्यार का भांडा फोड दिया जाए. सोना देने वाली मुर्गी को एक साथ काटने से बेहतर है की रोजाना उसके अंडे खाए जाएँ .
बिजली- एक न एक दिन तो यह होगा ही. कॉल करे सो आज कर , आज करे सो अब . पल में प्रलय होयगी , बहुरि करेगो कब ?
केशव- कल का काम आज पर करना चाहिए , जरूर करना चाहिए मगर कौन सा ? अच्छा काम . बुरे काम को हमेशा आगे पर टाल देना चाहिए .
बिजली - तुम इसमें क्यों इंटरेस्ट लोगे तुम्हें तो मजा मिल रहा है न. दो -दो जगह पर सुख भोगने को मिल रहा है. समझती हूँ सब.
केशव- वहां इतना सुख नहीं मिलता मेरी जान जितना की तुम्हारी रसभरी जवानी से मिलता है. तुम्हारा मादक यौवन अपने आप में एक मिसाल है यार... न जाने मैंने किस जन्म में और कितने नेक काम
किये होंगे , तभी तो यह सुख भोगने को मिल रहा है. मुझ पर नाराज होने का आपका हक है. मगर मैं क्या करून, मैं तो एक कटी पतंग की तरह हूँ, जिस तरह कटी हुई पतंग को लूटने के लिए सबके हाथ बढते हैं
ठीक उसी प्रकार मुझे लूटने के लिए सब तैयार रहते हैं और मौक़ा मिलने पर लूट भी लेते हैं. यूँ समझिए न कि मेरी नियति ही लुटना है और मैं बड़े आराम से लुटता रहता हूँ. जैसे कि अगर मैं चाहूँ भी कि यह रात
तुम्हारे साथ शेयर करून तो नहीं कर सकता. सेवक जों ठहरा . मैं रानी मैडम से ज्यादा आपको चाहता हूँ, इसलिए नहीं कि आप अभी जवान हैं और उनकी जवानी ढलान पर है,, इसलिए भी नहींकी यह बात मैं आपके सामने
कर रहा हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि यह सत्य है , मैं चाहता हूँ आपको.
बिजली- ठीक है, अगर इस बात में जरा भी सच्चाई है तो आज की रात को क़यामत की रात बना डालते हैं. आज तुम कहीं नहीं जाओगे . मेरे साथ इसी कमरे में रहोगे . मुझे कल रात वाला सुख दिलाओगे .
केशव- और रानी मैडम का क्या होगा ? मतलब, कि वे मेरा क्या हाल करेंगी , जानती हैं आप ?
बिजली- जानती हूँ तभी तो आह रही हूँ, बेफिक्र रहो. वे तुमसे टच भी नहीं कर सकतीं, मैं उनसे बात कर लूंगी.
बिजली के शब्दों से बगावत की बू आ रही थी. केशव कांपने लगा. उसे लगा कि बिजली गुस्से में आकर कुछ गलत कदम उठा सकती है, मगर वह कर भी क्या सकता था. वह सोच ही रहा था कि इतनी देर में बिजली ने
मोबाइल से फोन कर दिया , उसे समझते देर नहीं लगी कि उसे अपनी माँ रानी को ही कोंल किया होगा , वह कह रही थी-
-हेल्लो मोम... मुझे घबराहट सी हो रही है, मैं आपसे मिलना चाहती हूँ, आपके कमरे के सामने हूँ, तुरंत दरवाजा खोलिए .
रानी- मगर ... इस वक्त ? सब कुछ ठीक -ठाक तो है न ? क्या हुआ मेरी बच्ची को ?
बिजली- दिल नहीं लग रहा , कलेजा उड़ा -उड़ा सा लग रहा है. आपसे मिलना जरूरी है.
रानी- मगर मैं तो गहरी नींद में सो रही थी, ठहरो आती हूँ...
बिजली- तो रहने दो, आप आराम से सो जाइए , मैं केशव को बुला लेती हूँ, उसे लेकर डॉक्टर से मिल लेती हूँ.
रानी- ठीक है, ज्यादा प्रोब्लम तो नहीं है ?
बिजली- इतनी ज्यादा भी नहीं है, केशव संभाल लेगा . ओके बाय -... बाय..... गुड नाईट ...
बिजली के होठों से मुस्कान साफ़ दिख रही थी. वह अपनी सफलता पर इतराना चाहती थी. केशव यह जाताना चाहती थी कि उसकी घर में कितनी चलती है. इठलाते हुए बोली-
- अब समझे सरकार. मैं इसलिए कह रही थी. अब तो मैंने बाकायदा परमीशन भी ले ली है. अब तो कोई दिक्कत नहीं है ? अब बिंदास होकर इस जवानी का रस चूस सकते हो. कल से तुमने मुझे बहुत तरसाया है. अब मैं
और ज्यादा तड़प महसूस नहीं करना चाहती .
केशव- तुम बहादुर हो , अपने हक के लिए लड़ना जानती हो ...
बिजली- हाँ, लड़ना भी और जीतना भी. मेब जवानी की तरफ कदम रख रही हूँ, तुमने ही मुझे कली से फूल बनाया है.
केशव- मैंने सिर्फ कोशिश की है, सारा श्री तो तुमको ही जाता है.
बिजली-जब मेरी शादी होगी तो मेरा पति भी मुझे इतना आनंद नहीं दे सकता , जितना कि तुमने दिया है. इसलिए शादी के बाद भी मैं तुम्हें अपने साथ रखना चाहूंगी , तुमसे सम्बन्ध बनाए रखना चाहूंगी .तुम तो जानते हो
कि सामाजिक द्रष्टिकोण से शादी भी बहुत जरूरी है. मगर सिर्फ सुरक्षा के लिए . बाकी असली साजन तो तुम ही रहोगे .

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