Sunday, November 14, 2010

पलवगुरु-९७
्राप्त कर लिए हैं. मैं जानना चाहती थी कि तुम्हारे जीवन में पैसे का कितना महत्त्व है ? अगर तुम पैसे के लिए अपनी पत्नी की ह्त्या करने के लिए तैयार हो जाते तो मैं बहुत जल्द तुमसे किनारा कर लेती. तुम बहुत
ऊंचे आदर्श रखते हो केशव , मुझे तुमसे प्यार करके गर्व की अनुभूति हो रही है.
केशव- अच्छा आआआआआ ... तो आप मेरा एक्जाम ले रही थीं ? अब आकर मेरी जान में जान आयी है, ओह मैं तो डर ही गया था. अगर आप थोड़ी देर और इस नाटक को जारी रखती तो हो सकता है कि
मुझे हार्ट अटैक हो जाता. सच कहता हूँ.
बिजली- क्या बकबास करने लगे केशव, अटेक आये तुम्हारे दुश्मनों को , तुम तो जान हो मेरी. देखो न यह प्यासी जवानी किसी तरस रही है. इस जवानी की आग को बुझाओ ना.
केशव- इस रंगीले यौवन का रस चूसने का मुझे जों अवसर मिला है, मैं भी इसका भरपूर फ़ायदा उठाउंगा...
बिजली- तो आओ न, मुहूर्त का इन्तजार कर रहे हो क्या ? आओ , आकर घटाओं की तरह छा जाओ, यौवन की कलियाँ तरस रही हैं, इन्हें भंवरों की तरह चूम्लो , चूस लों इस कुंवारे रस को.
केशव- इतनी उत्तेजक, इतनी मादक, इतनी प्यारी बातें आज से पहले मैंने कभी नहीं सूनी. कानों में मिसरी सी घुल रही है. आनंद बढ़ता ही जा रहा है.
बिजली- मगर मैं तो आनंद की पराकाष्ठा तक पहुँच चुकी हूँ. यहाँ से आगे अब मुझे कुछ नहीं भाता, कुछ नहीं सुहाता. सिर्फ और सिर्फ तुम दिखाई देते हो. मैं जों बोल रही हूँ , वो सोच समझकर नहीं , बल्कि अपने आप हो
रहा है. शब्द खुद ही अपना अस्तित्व ढूंढ रहे हैं. बहुत अच्छा लग रहा है.
केशव- जी चाहता है कि जब तक साँसे चल रही हैं, तब तक इन्हीं शब्दों को सुनता रहूँ, काश ... ऐसा हो.
बिजली- ऐसा ही होगा मेरे केशू ... जीवन भर तक ऐसे ही सुनते रहोगे , मैं सुनाती रहूंगी. तुम इतने परफेक्ट मर्द दीखते हो कि जुबान खुद ही कामुक हो जाती है. तुम्हारे स्पर्श में इतनी ताकत है कि छूते ही कामवासना
जाग्रत होने लगती है. जिस्म सुलगने लगता है. बुझी हुई चिंगारी भी ज्वालामुखी का रूप धारण करने लगती है.
केशव- यही हालत तो मेरी भी है. मेरा बदन भी आग की भट्टी की तरह दहक रहा है. लेकिन मैं पहले तुम्हारे अंग -प्रत्यंग को चूमने के इजाजत चाहता हूँ.
बिजली- इजाजत है. इस शरीर के प्रत्येक अंग पर तुम्हारा ही नाम लिखा है. जों चाहे करो , कोई आपत्ति नहीं है.
केशव- तुम तो ऊपर से लेकर नीचे तक क़यामत ही क़यामत हो , समझ में नहीं आता कि प्यार शुरू कहाँ से करू ?
बिजली- यह सोचने या समझने का वक्त नहीं है. कुछ कर गुजरने का वक्त है. भावनाओं को मंजिल तक पहुंचाने का काम करें ..
बिजली ने ये शब्द बोलकर एक तरह से खुला आमंत्रण दे दिया था. अब वह कामवासना की आग की लपटों से घिर चुका था. उसने बिजली के रसीले होठों से अपने होठ सटा दिए, बिजली ने कसमसाना शुरू कर दिया.
जब उसने दो मिनिट तक बिजली के होठों का रसपान किया तो उसके जिस्म में खलबली मच गयी. उसने केशव के खास अंग को सहलाना शुरू कर दिया. उसका अंग सख्त तो था ही , अब और भी ज्यादा सख्त हो
गया. बिजली ने आक्रामकता दिखाते हुए कहा केशव के उस विशेष अंग को चूम लिया. इसके बाद वह बोली-
- आह.... तुम्हारा यह हथियार मेरी आँखों में चमक ला देता है. ऐसा लगता है जैसे कि मुझे संजीवनी मिल गयी हो. आई लव इट केशव. आई लव सो मच ...
केशव -सिर्फ इसको ही , और मुझे ?
बिजली- यह भी तो तुम्हारा ही है न... और यह किसका है ?
केशव- अब मैं मेरा कहाँ रह गया हूँ ? यह भी मेरा नहीं रहा. तुम्हारा हो गया है जान... तुम भी इसका चाहे जैसा इस्तेमाल करो.
बिजली- अच्छा जी, समझ रही हूँ. तुम भी बहुत बेहतरीन बोलने लगे हो.
केशव- असर तो पड़ता ही है. थोड़ा-थोड़ा तुम्हारा असर हो रहा है. और किसका होगा ?
बिजली- अब तक तुमने कितनी लड़कियों के साथ रंगीन रात बिताई है केशव ? देखो, झूठ न बोलना . मुझे कोई ऐतराज नहीं है. भले पहले तुमने कुछ भी किया हो और बाद में भी चाहे जों करो.
केशव-तुम चौथी हो मेरी जान. इनके अलावा औरकिसीके साथ सेक्स नहीं किया.
बिजली- अच्छा, सेक्स नहीं किया .तो रोमांस तो किया होगा,. वो कितनी हैं ?

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