Sunday, November 16, 2008

भाग-२०

आखिरकार इंसानियत भी तो यही कहती है... अगर हम एक दूसरे का फायदे करते हैं तो इससे दोस्ती भी मजबूत होती है और मन को सुकून भी मिलता है...
रमेश- क्या आपकी सहेली भी अपना इस तरह का कोई सुख तुमसे शेयर करती है...
प्रभा- हाँ, हाँ क्यों नहीं ? ऐसा भी हो जाता है... अगर उसको लगता है की कोई लड़का मेरे लायक है तो वह मुझे बता देती है , फ़िर यदि मुझे मामला जम गया तो प्रोग्राम सेट हो जाता है...
रमेश- मेरे लिए ये सब नई बातें हैं... मैंने कभी ऐसा सूना भी नहीं हैं... यहाँ तक की किसी फ़िल्म में भी नहीं देखा ...किसी कहानी में भी नहीं पढा... अगर मैं किसी से यह बात कहने भी लागून तो कोई नहीं मान सकता... ये अलग बात है की यह राज तो हमेशा मेरे सीने में ही दफ़न रहेगा .... ये बातें किसी से कहने सुनने की थोड़े ही होती हैं...
प्रभा- यही बातें तुम्हारी दिल को छू लेती हैं... मैंने तुम्हारा चुनाव करके कोई ग़लत काम नहीं किया... मुझे मालोम है , तुम्हारा दिल बड़ा साफ़ है... दोस्ती में इसी की जरूरत होती है... जीवन में कभी भी किसी से प्यार करना, यह ध्यान रखना की कभी भी तुम्हारी वजह से उस लड़की की बदनामी नहीं होनी चाहिए... कहते हैं की बाद अच्छा और बदनामी बुरी होती है... तुम जिस लड़की से दोस्ती करते हो, वह पूरी तरह से तुम पर आश्रित हो जाती है... जब वह तुम पर अपनी इज्जत भी न्योछावर कर देती है तो उस पर आख़िर क्या बचता है ? वह तुमसे अपनी लाज बचाने की उम्मीद तो कर ही सकती है... अगर वह तुम्हारे साथ ख़ुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेगी तो वह तुम्हारे साथ वफादार बनी नहीं रह सकती... तुमने ऐसे लोगों के बारे में नहीं सुना जो पैसे लेकर महिलाओं को बिस्तर पर संतुष्ट करने का काम करते हैं... जिस प्रकार मर्द अपना टेस्ट चेंज करने के लिए कोठों का सहारा लेते हैं उसी तरह महिलायें भी अब पुरूष वेश्याओं का सहारा लेने लगी हैं... यह चलन सम्रद्ध देशों में ज्यादा है... भारत में जो बड़े शहर हैं और वहाँ ज्यादा कमाने वाली महिलायें हैं वे इस तरह की सेवा का सहारा ले लेती हैं... जो महिलाए कम उम्र में विधवा हो जाती हैं, मगर किसी कारण दूसरी शादी नहीं करतीं वे पुरूष वेश्याओं के साथ सम्बन्ध बना लेती हैं... वे अपना मनपसंद का साथी चुनती हैं और बदले में बाकायदा उसकी कीमत भी चुकाती हैं.... जो महिलायें इससे उकता चुकी हैं या इस राह को ग़लत मानती हैं वे अपने दोस्त बना लेती हैं... जिसे हम दोस्त बन गए हैं...
रमेश- यह तो बड़ी हैरत की बात है... मैंने वास्तब में कभी नहीं सुनी ... अच्छा ये बताओ की तुमने कभी पुरूष वैश्या का साथ नही पकडा ?
प्रभा- नहीं बिल्कुल नहीं... मेरी कुछ सहेलियों का अनुभव अच्छा नहीं रहा... इसलिए मैंने कभी इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया.... यहाँ तक की हमारे ग्रुप में जितनी भी महिलायें हैं वे कभी पुरूष वेश्याओं के पास नहीं गईं... मजा ही तो लेना है, इसके लिए स्टूडेंट मिल जाते हैं... उनकी भी जरूरत पूरी हो जाती है और हमारा भी मन रह जाता है...
रमेश- तुम्हारे ग्रुप में कुल कितनी महिलायें हैं ?
प्रभा- तुम तो ऐसे सवाल कर रहे हो जैसे किसी अखबार का रिपोर्टर पूछ रहा हो...

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