Saturday, November 15, 2008

भाग-१९

प्रभा पहली बार तो सेक्स का सुख उठा नहीं रही थी, इससे पूर्व भी वह कई लोगों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाकर आनंद का सागर लूट चुकी थी... रमेश इन सबसे जुदा था... जब वह आक्रमण करता तो फौज की तरह करता था... जैसे आदेश मिलते ही सेना अपने दुश्मन पर टूट पड़ती है , रमेश भी इसी प्रकार के कड़े तेवर दिखाता था... उसकी सख्ती से प्रभा को अपार सुख मिलता था... वह रमेश के एक -एक प्रहार पर धन्यवाद दिए बिना नहीं रहती थी... जब रमेश ने दूसरी बार उस पर हावी होना शुरू किया तो वह खुशी से रमेश के जिस्म से बेल की तरह लिपट गयी... रमेश बोला-
-तुम्हारे चेहरे से तो खुशी झलक रही है , फ़िर जुबान खामोश क्यों है ?
प्रभा- मैं इस समय बेहद खुश हूँ... इस खुशी को अपने अन्दर समाहित कर लेना चाहती हूँ...
रमेश-मैं कैसे यकीन करूँ ? तुम्हारी तरह दिल की बातो को पढने की शिक्षा मैंने नहीं ली...
प्रभा- बहुत शरारती होते जा रहे हो तुम ? लेकिन उतने पावरफुल भी हो... मेरे पति भी मुझे बिस्तर पर अच्छी तरह से संतुष्ट करते हैं मगर तुम उनसे भी आगे हो... सच कहती हूँ, तुम्हारे सामने मैं अपने पति को भी भूल गयी हूँ... मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है की तुम्हारा कोई जवाब नहीं है की तुमने जीवन में मुझे सबसे ज्यादा संतुष्ट किया है...
रमेश- इन शब्दों को सुनकर मैं तो धन्य हो गया... तुमने झूठी तारीफ़ की है या सच्ची, यह तो मैं नहीं जानता... मगर ये तय है की इतना आनंद मैं हमेशा देने का वादा करता हूँ... अभी तो यह मेरी शुरुआत है... आगे से जब मैं किसी महिला के साथ सम्बन्ध स्थापित करूँगा तो उससे भी तुम्हारी तारीफों के पुल बांधूंगा...
प्रभा- ठीक है , अभी तो कुछ दिन मैं यहीं पर रहूंगी... जाने से पहले अपनी एक सहेली को तुम्हारे हवाले कर जाउंगी... बड़े गज़ब की है... वह भी शादीशुदा है... उसकी एक बेटी भी है मगर फिगर के मामले में उसका कोई जवाब नहीं है... आज भी उसके सामने १६ साल की लडकियां फेल हैं... अगर एक बार उससे मिलोगे तो फ़िर उसी के होकर रह जाओगे... यहाँ तक की मुझे भी भूल जाओगे...
रमेश - ये तो बस कहने की बातें हैं इनको कहने के लिए ही रहने दीजिये... जब तक मेरा अस्तित्व रहेगा तब तक तुम्हारी यादें मेरे दिलो -दिमाग में बनी रहेंगीं... तुम्हारी एक क्या एक हजार सहेलियां भी मेरा ध्यान तुम्हारी तरफ़ से नहीं हटा पाएंगी.... मैं क्या जानता था की जिस्मानी सुख क्या होता है ? इससे तुम्हीं ने तो परिचित कराया है... यह भी सच ही है की मैं बहुत परेशान था... मुझे उम्र के इस मोड़ पर एक अदद लड़की की जरूरत थी, जिसे तुमने पूरा कर दिया... प्यास आख़िर प्यास ही होती है... उसको खाने से नहीं बुझाया जा सकता... प्यास बुझाने के लिए तो पानी की ही जरूरत पड़ती है...
रमेश- अपने स्थान पर अपनी सहेली को एडजस्ट करके तुम्हें अजीब सा नहीं लगेगा ?
प्रभा- इसमें अजीब की क्या बात है ? हम दोनों अच्छी सहेलियां हैं , एक दूसरी का दुःख-सुख भी शेयर करते हैं करना भी चाहिए... इसमें हर्ज भी क्या है ?


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