रागिनी- हां, प्रभा मुझसे बहुत प्यार करती है... इतना की मैं बयान नहीं कर सकती...
प्रभा- अगर ये संतुष्ट हो जाए तो मुझे लगता है जैसे की मैं ख़ुद संतुष्ट हो रही हूँ... अगर ये खाना खा ले तो भूख मेरी मिट जाती है... यह मेरी जान से भी बढ़कर है... इसको खुशी देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है...
रागिनी- अब मैं फ्रेश होकर आती हूँ तुम और रमेश मिलकर एश करो... तुम्हारी सारी तकलीफें दूर हो जायेंगी... रमेश जादू जानता है... यह ऐसा जादूगर है , जो जादू तो दिखाता होई है, साथ ही जादू तैयार भी करता है...
प्रभा- ठीक है... अब मेरी फ़िक्र छोडो... तुम दोनों ही यहाँ से बाथरूम की तरफ़ चलो, मैंने खाना तैयार करवा दिया है... नहाने -धोने के बाद खाना खा लीजिये...
रागिनी- नहीं, नहीं ऐसे मजा नहीं आएगा... जब तक तुम भी रमेश के साथ जिस्मानी सुख नहीं भोगोगी तब तक आनंद अधूरा ही रहेगा... मैं यहीं पर रहूंगी... अपने सामने तुमको सुख लूटते हुए देखूंगी...
प्रभा- नहीं.... आज इच्छा नहीं है... फ़िर कभी सही... रमेश तो यहीं रहता है, जब भी मन करेगा, तभी इसकी सेवाएँ ली जा सकती हैं...
रागिनी- इससे पहले भी तो हम इस प्रकार प्रणय क्रीडा का मजा उठा चुके हैं... तुम उस नए लड़के के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना रही थीं और मैं तुम दोनों को उत्साहित कर रही थी... आह, उस समय कितना अच्छा नजारा था... मन में लड्डू फ़ुट रहे थे... तुम उसके होठों को चूम रही थिओं और मैं आनंदित हो रही ...
प्रभा- उस वक्त बी ही तो तुमने ही जिद की थी... मैंने स्वीकार करली... क्या करती, आखिरकार तुम्हारी हर बात तो मुझे माननी ही पड़ती है... और ऐसा मैं किसी मजबूरी के तहत नहीं बल्कि , प्यार की खातिर करती हूँ...
रागिनी- उसी तरह अब भी मेरी बात मानलो... मानोगी तो फायदे में रहोगी ....
प्रभा- कल रही... अगर तुम्हारी इतनी ही इच्छा है तो कल हम दोनों मिलकर साथ-साथ इश्क का खेल खेलेंगे... मैं भी मानसिक रूप से तैयार हो जाउंगी और कल रमेश भी शारीरिक रूप से फिट रहेगा...
रमेश उन दोनों की बातों को ध्यान से सुन रहा था... आखिरकार रागिनी ही मान गयी... उसने प्रभा की बात को स्वीकार कर लिया... रागिनी ने खाना खाने से इनकार कर दिया था... वह जाते-जाते रमेश को ५०० रुपये का एक नोट भी देती गयी... थोडी सी ना नुकर के बाद जिसे रमेश ने स्वीकार कर लिया था... पहली बार ऐसा करते हुए उसे महसूस हुआ जैसे किसीने उसके स्वाभिमान को कुचला है... वह अपनी ही नजर में गिरा हुआ था... उसको लगा जैसे उसको भी पुरूष वैश्या बना दिया गया है... जिस तरह महिला वेश्याओं को दौलत देकर उनके जिस्म का मनचाहा उपयोग किया जाता है , ठीक वैसा ही व्यवहार उसके साथ किया जा रहा था... वह ख़ुद को किसी से नजर मिलाने के काबिल भी नहीं समझ रहा था... ऐसा नही होता है, जब इंसान का नैतिक पतन शुरू हो जाता है...
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