Thursday, November 27, 2008

भाग-३१

रमेश- तुम्हारे लिए अभी भी पूरा दम-ख़म बाकी है... मैं ठहरा सेवक... ढोलिया का क्या काम होता होता है ढोल बजाना... कोई समय हो या फ़िर कैसा भी माहोल हो, वह अपने कर्तव्य का निर्वहन करता ही है...
प्रभा - हाँ, ये बात तो है... मैं सोच रही थी की मजा तो मैं भी पहले ही ले ही चुकी हूँ , फ़िर क्यों न अब तुम्हें आराम करने दूँ... आखिरकार तुम कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हो...
रमेश- मेरा इतना ख़याल रखने का शुक्रिया... मैं जीवन भर तुम्हें याद करता रहूँगा...
प्रभा- एहसान तो तुम्हारा है मुझ परतुमने मेरे अंधेरे रास्तों को उजालों से रोशन कर दिया है...
रमेश- और मैंने तो डॉक्टर बन्ने की आश भी छोड़ दी थी... यह तो अच्छा हुआ की तुमने अपनी सहेली से मेरा यह काम करवाने का आश्वाशन दिलवा दिया... जब उन्होंने कह दिया है तो उस पर अमल भी करेंगी ही... वैसे तो सभ्रांत महिला लग रही थीं...
प्रभा- इसमें डाउट करने जैसी कोई बात नहीं है... वह मेरी बचपन की सहेली है... मैं उसको बहुत अच्छी तरह से समझती हूँ... उसका अरबों का व्यापार है... जुबान की पक्की है... थोडी सी मनचली और जिद्दी किस्म की है... बस इतना ध्यान रहे की उसको कभी नाराज ही मत करना... जब भी एडमिशन का समय हो तभी बता देना... सारा काम वह ख़ुद करवा डालेगी... अगर चाहो तो कुछ पैसे मैं एडवांस भी दिलवा सकती हूँ...
रमेश- यह काम कल हो करवा देंगी तो अच्छा रहेगा, क्योंकि मुझे रुपयों की सख्त जरूरत भी है... ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ की मुझे रागिनी पर विश्वाश नहीं है... बल्कि जरूरत की वजह से कह रहा हूँ... तुम तो समझ रही हो न...
प्रभा- हाँ , अच्छी तरह से... तुम्हें रागिनी से मिलवाने का मकसद भी यही है की तुम्हारी आर्थिक तकलीफें दूर होती रहें... तुम भी याद करो की कोई मिली थी... वरना तुम जैसे खूबसूरत नौजवान का प्यार मैं हरगिज नहीं बांटती ...
रमेश- अगर ऐसी बात है तो मैं पैसे और प्यार में से प्यार को चुनना पसंद करूँगा ... मुझे रागिनी की दौलत से तुम्हारे मोहब्बत की अथाह दौलत पसंद है...
प्रभा- तुम्हारी भावनाओं को मैं अच्छी तरह से समझती हूँ... मगर यह भावुक होने का समय नहीं है... अच्छा वक्त हमेशा नहीं मिलता... कहते हैं की दुनिया में रोजाना सोने चांदी की नदी बहती हैं... जो पारखी लोग होते हैं वे इन्हें हासिल कर लेते हैं और नादाँ के हाथों में पत्थर के सिवाय कुछ नहीं मिलता...

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