Sunday, November 16, 2008

रंगीएला रतन , भाग- ६-११-2008

Thursday, November 6, 2008

रंगीएला रतन , भाग- ६-११-2008
रंजना अब रवि को अपनी दास्ताँ सूना रही थी... रवि भी दिल से हर बात सुन रहा था... रंजना को धोखा देने वाले रमेश पर उसको क्रोध आ रहा था ... वह कहने लगा -- अगर तुम कहो तो मैं उस बेवफा रमेश की गोली मारकर ह्त्या कर डालूँ... बस तुम्हारे आदेश की जरूरत है...रंजना- नहीं रवि, मैं ऐसा नहीं करवा सकती... यह मेरे वश की बात नहीं है... मैं तो प्रेम की पुजारिन हूँ... प्यार करना मेरा धर्म है... जान लेना जल्लादों का काम होता है... मैं अपनी जान दे सकती हूँ मगर किसी की जान ले नहीं सकती... कुछ भी हो, मैंने कभी रमेश से प्यार किया था... उसी रमेश को मरवाने की बात मैं ख्यालों भी नहीं सोच सकती... मेरे सीने में भी दिल धड़कता है....
Posted by geet gazal ( गीत ग़ज़ल ) ) at 12:29 AM 0 comments
Tuesday, November 4, 2008

रंगीला रतन , ५-११-2008
रवि बेहद खुश था मगर रंजना के जाने वाली बात ने उसको उदास कर दिया ... वह रंजना के अतीत की दास्ताँ को ध्यानपूर्वक सुन रहा था... रंजना कह रही थी-रमेश को देखते ही मेरे मन में प्यार के कोपल फूटने लगे थे.... मैं बचपन से ही ज़ज्बाती रही हूँ... जो मेरा दिल कहता है, वही करती हूँ... मैं एक ही विचार से बंधकर नहीं जी सकती...आजाद जिन्दगी जीना मेरी फितरत है... मैं कभी भी दबकर नहीं रही... मुझे जो अच्छा लगता है, खाती हूँ, पीती हूँ और ऐसे ही जीती हूँ... मेरे जीने का तरीका अलग है... इससे मेरे घरवाले नाराज रहते थे...रवि- आपके पिताजी क्या करते हैं ?रंजना- वों भी डॉक्टर हैं...लेकिन वे मुझसे ज्यादा मतलब नहीं रखते... मेरी जीवन शैली उनको पसंद नहीं, और उनका व्यवहार मुझको नागवार गुजरता है... उनके सिद्धांत मुझे अच्छे नहीं लगते ...इसके पीछे भी रमेश ही था... वह गरीब घर से ताल्लुक रखता था... मेरे पिता उसके साथ मेरा मोल-जोल पसंद नहीं करते थे... इसी कारण वों मुझसे बहुत नाराज हुए... रमेश के मन में कुछ और ही चल रहा था... वह मेरे परिवार की दौलत पर नजर रखता था... उसकी सोच यह थी की मुझे बकरा बनाकर वह करोडो की दौलत का मालिक बनाना चाहता था... मैं नादाँ थी... मुझे दुनियादारी का इल्म नहीं था... मैं तो प्रेम दीवानी बनकर उसी के गुन गा रही थी...मेरे मन मन्दिर में रमेश की सूरत ही बस गयी था ...वह मेरी धड़कन बन चुका था... एक दिन उसने मुझे अपने कमरे पर बुलाया... शाम का समय था... मैं सजधजकर रवि के पास पहुच गयी... उसने मेरा दिल से स्वागत किया और खुशी का इज़हार करने के बहाने से मेरा चुम्बन ले लिया... यह मेरा पहला अनुभव था... किसी लड़के ने पहली बार मेरा चुम्बन लिया था... मैं सिमटकर रह गयी... मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा था... मैं शरमाकर बैठ गयी... रमेश कहने लगा-- आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो... इस हुस्न को देखकर चाँद भी शर्मा जायेगा... काला टीका लगा देता हूँ वरना किसी की नज़र लग जायेगी...रंजना- आजकल तारीफ़ बहुत करने लगे हो, मन में कोई खोट तो नहीं आ गया ?रवि- जी तो चाहता है की आगे बढ़कर तुम्हारे इन रसीले होठों को चूम लूँ... मगर...रंजना - मगर क्या ?रवि- डर जाता हूँ... सोचता हूँ कहीं तुम नाराज न हो जाओ...रंजना- अगर तुमको मेरी नाराजगी का डर होता तो अब तक मेरे सामने ऐसी बात न कहते॥रवि - फ़िर किस्से कहूं दिल की बातें... दुनिया में एक तुम ही तो हो जिससे दिल लगा हुआ है... तुम्हारे बिन कुछ अच्छा नहीं लगता ... न नीद आती है, न चैन आता है... हर घड़ी तुम ही तुम दिखाई देती हो... पता नहीं ये कैसी प्यास है, जो कभी नहीं बुझती... एक तुम ही तो हो जिसे मैं कभी भी अपने से दूर नहीं पाटा... जब भी जी होता है, तभी मन के आयने में तुम्हारी सूरत देख लेता हूँ...फ़िर भी बेकरारी बढती जाती हैं...
Posted by geet gazal ( गीत ग़ज़ल ) ) at 11:01 PM 0 comments

४-११-२००८ , रंगीला रतन
जिस्म की प्यास इंसान को कभी-कभी पतन की तरफ़ ले जाती है... रंजना के साथ भी कुछ यही हो रहा था... वह एक लड़के से प्रार करती थी... उसको दिलो-जान से चाहती थी...उसके प्यार में वह खुद्द को भी भूल गयी... अब उसकी द्रष्टि रमेश पर ही लगी रहती थी... जब वह पढने के लिए बैठती तो उसको रमेश का चेहरा ही दिखाई देता था... खाना खाती तब भी और घर से कहीं बाहर निकलती तब भी... उसकी नज़र में रमेश ही सब कुछ था... रमेश खुश मिजाज़ लड़का था... उसका व्यक्तित्व सबसे अलग था... इतना अलग की रंजना उसकी दीवानी बनकर रह गयी... वह नहाने के बाद इस वक्त उसी के ख्यालों में खोई हुयी थी... पहली बार जब रवि ने रंजना को चिंतित देखा तो पूछ बैठा-- ये गुलाब का फूल मुरझाया हुआ सा क्यों है ? लगता है मुझसे मिलना अच्छा नहीं लगा ? मैंने तो आपको पहले ही बता दिया था की मैं अनुभवी नहीं हूँ... बिल्कुल अनाडी हूँ... महिलाओं को बिस्तर पर संतुष्ट करने की कला मुझे नहीं आती... मैं हमेशा दूसरे साथियों की बातें ही सुनते आया हूँ... हो सकता है की अब मैं संतुष्ट कर्र पाऊं... अब थोड़ा- थोड़ा तरीका आ गया है...रंजना- आनंद तो मुझे बहुत आया है... इतना की मैं बता नहीं सकती... इतना जानलो की जबसे मुझे स्वाद शब्द का ज्ञान हुआ है तबसे इतना स्वाद कभी नहीं आया... तुम तो साक्षात् कामदेव हो... तुम्हारे अंग-अंग में शक्ति का तूफ़ान है... मैं तुमसे खुश हूँ ... बस मेरा ध्यान ज़रा अतीत की तरफ़ चला गया था...रवि- पहले ही मैं आपसे पर्सनल सवाल करके खता कर चुका हूँ... मुझे लगता है मुझे कोई भी पर्सनल सवाल नहीं करना चाहिए था...रवि-नहीं... ऐसी बात नहीं है... तुमको हक़ है सवाल करने का... तुम अगर पर्सनल सवाल नहीं करोगे तो कौन करेगा ? मैं तो ख़ुद भी सोच रही थी की अपने मन की बात कह डालूँ...मन पर बोझ सा है... sunaa है की मन की बात किसी से कहने पर बोझ हल्का हो जाता है...रवि- अगर ऐसी बात है तो फ़िर जरूर कहो... मैं ध्यान से सुनूंगा... मैं तो यही सोच बैठा था की शायद तुम्हारी उम्मीद के मुताबिक मैं संतुष्टि नहीं दे पाया ...रंजना- बिल्कुल ग़लत सोच रहे थे तुम... मैं तो बेहद खुश हूँ... तुम क्या जानो, शायद तुम नहीं मिलते तो मैं पागल हो जाती... मुझे प्यार में धोखे ही धोखे मिले हैं... जब मैं एम् बी बी एस कर रही थी तो साथ में पढने वाले रमेश से मुझे प्यार हो गया... मैं तो उसको अपना सब कुछ मान बैठी थी... वह मेरे दिलो दिमाग पर जादू की तरह छा गया... मैं तो दीवानी हो गयी थी...

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