मं तो इसको अपना सौभाग्य समझूंगा... मुझे तो वैसे भी इस काम में महारत हासिल है.... गाँव में अपने दादाजी की खूब मालिस करता हूँ... मगर तेल तो शायद यहाँ नहीं होगा...रंजना- तुम्हारे हाथों का स्पर्श ही काफी है... मेरे करीब आ जाओ ... खिड़की दरवाजे ठीक तरह से बंद करदो...रवि की साँसें ऊपर -नीचे हो रहीं थीं... दिल ऐसे धड़क रहा था, मानो सीने से निकल कर बाहर आ जायेगा... वह रंजना के पास आ गया... उसकी समझ में नहीं आ रहा था की शुरात कहाँ से करे... मर्द की बात और होती है... उसकी झिझक रंजना की समझ में आ गयी... वह अपना ऊपरी वस्त्र उतारते हुए बोली-- अच्छा अब तुम आराम से अपना काम कर सकते हो... अगर तुम लड़कियों की तरह शर्माते रहे तो मुझे सच्चा सुख नहीं मिल पायेगा... मैं तो तुम्हारे साथ सच्चा सुख शेयर करना चाहती हूँ...तुम्हें मुझसे कोई स्वार्थ नहीं है, जाहिर सी बात है मुझे भी कोई लालच नहीं... ऐसे रिश्ते बड़े मजबूत होते हैं...रवि- आपने जिन्दगी के बारे में बहुत तजुर्बा हासिल कर लिया है...रंजना- यदि तुम मन लगाकर अपने काम को अंजाम देते रहे तो यह तजुर्बा तुमको भी मिल सकता है...रवि झेंप गया... वह रंजना की कमर पर हाथ फिराने लगा... रंजना ने अपनी आँखें मूंडली ... जैसे वह अपार सुख को अपने अन्दर समेटने का प्रयास कर रही हो... जब रंजना ने आह भरनी शुरू की तो रवि के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गयी... उसके हाथ काँपने लगे ... डरते - डरते उसने रंजना की गोलाइयों को दबाना आरम्भ कर दिया ... ठंडी आह भरते हुए रंजना बोली-- ओह... बहुत सुख मिल रहा है... मगर थोड़ा आहिस्ता-आहिस्ता .... रंजना ने यह बात इस अंदाज में कही थी मानो वह शिकायत नहीं मनुहार कर रही हो... रवि अभी तक अपने आपको सहज महसूस नहीं कर पा रहा था.... उसके दिल की धड़कने लगातार बढ़ती जा रहीं थीं... रंजना की बातों से वह भ्रमित हो गया था .... वह यह तय नहीं कर पा रहा था की आख़िर उसके कहने का उद्देश्य क्या है ? कभी कभी वह बड़ी उलझी हुई बातें कह दिया करती थी... उसकी इन्हीं बातों से वह परेशान था और अपनी भूमिका तय नहीं कर पा रहा था... रंजना उसको रहस्यमयी व्यक्तित्व की मलिका नज़र आ रही थी... जब वह किसी नतीजे पर नहीं पहुच पाया तो उसने पूछ ही लिया-- मैं भरम का शिकार हूँ... मेरा मोटा दिमाग है... ज्यादा पढा लिखा नहीं हूँ न , शायद इसलिए... मेरी समझ में वही बातें आती हैं जो सीधी और सरल होती है... उलझी हुयी या भारी भरकम बातें मेरे सर के ऊपर से गुजर जाती हैं... मुझे तो बस इस तरह के आदेश दीजिये जो आसानी से मेरी समझ में आ जाएँ ....रंजना- अच्छा, मुझे बना रहे हो... तुम्हारे मन मेन इस वक्त क्या चल रहा है, मैं वों भी बता सकती हूँ...रवि- आप डॉक्टर के अलावा ज्योतिषी भी हैं क्या ?रंजना- मैं मनोविज्ञान समझती हूँ ... और बहुत अच्छी तरह से समझती हूँ... तुम एडा बनकर पैदा खाना चाहते हो... तुम अपनी इच्छाओं की पूर्ति भी करना चाहते हो और अपनी जुबान भी हिलाना चाहते ... मैं ग़लत कह रही हूँ क्या ?
Posted by geet gazal ( गीत ग़ज़ल ) ) at 4:46 AM 0 comments
Thursday, October 30, 2008
रंगीला रतन - करंट
रवि की तो जैसे बोलती ही बंद थी, उसने कब सोचा था की उसको एक हसीना ऐसे सरे राह मिल जायेगी ... उसने रंजना के कहने से एक पैग होठों से लगा लिया... रंजना के सामने ही उसने कहा था की वह sharaab को हाथ भी नहीं लगाता ... मगर असल me वह यार दोस्तों के साथ पहले भी इसका स्वाद चखता रहता था... रंजना पर प्रभाव डालने के इरादे से वह इस तरह की बात कर रहा था ... रवि उसी के पास बैठ गया ... रंजना ने जो कपड़े पहन रखे थे, उनमे से रंजना के जिस्म के कंटीली अंग साफ़ दिख रहे थे... वह चोरी-चोरी उसके यौवन उभारों को देख लिया करता था... जब वे दोनों दो-दो पैग समाप्त कर गए तो रंजना ने पूछा-- ऐसे क्या देख रहे हो ? क्या तुम्हें ये गूलाइयां अच्छी लगती हैं ?रवि- फिलहाल अच्छी लग रही हैं... मैंने पहले कभी तो देखा नहीं...सुंदर तो किसी की दूर से भी नहीं देखीं... मैं आपको चढ़ा नहीं रहा हूँ... दिल से कह रहा हूँ... ये न समझना की मैं किसी और मकसद से ये सब कह रहा हूँ....रंजना - मैं अच्छी तरह से जानती हूँ की तुम ऐसे नहीं हो, अगर ऐसे-वैसे होते तो मुझे अपने कमरे में शरण क्यों देते हीज है, जब तक हम इससे ? एक नेकदिल इंसान ही किसी अनजान महिला की इउस तरह सहायता कर सकता है... मुझे रहने को भले ही कमरा मिल जाता मगर व्हिस्की नहीं मिल पाती, और बिन आ पिए मुझे नींद ही नहीं आती... यह दारू भी बड़ी कमबख्त चीज़ है , जब तक हम इसको हाथ नहीं लगाते , तब तक इसे नफरत करते हैं और एक बार जब जाम थाम लिया तो इससे जिन्दगी भर के लिए प्यार कर बैठते हैं... aउर हाँ, प्यार से एक बात याद आई... यह प्यार तो शराब से भी कमीनी चीज है... मजबूरी में झूठ बोलो, चोरी करो, अगर और भी ज्यादा मजबूरी है तो कत्ल भी कर डालो , चलेगा...मगर कभी किसी से प्यार मत करो....दुनिया में बड़ी से बड़ी सजा फांसी होती है, जो इसी जन्म में पूरी भी हो जाती है... मगर प्यार ऐसी खता है, जिसकी सजा कभी किसी जन्म में पूरी नहीं होती... अब मुझे ही देख लो, मुझसे यह कसूर न जाने किस जन्म में हुआ था की अभी तक सजा भुगत रही हूँ... मुझे जो भी अच्छा लगता है वह मुझसे दूर हो जाता है... पता नहीं मेरे aअज ही ऐसा क्यों होता है ? अच्छा तुम्हीं कहो क्या तुमने कभी फांसी से बड़ी सजा देखि -सुनी है?रवि- बिल्कुल नहीं... कभी किसी किताब में भी नहीं पढी ....रंजना - लेकिन मैंने महसूस किया है इसको...ख़ुद भोग है ....रवि- तुम्हारे हँसते हुए चेहरे को देखकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता की तुम्हारे सीने में इतना दर्द ,होगा ... कैसे सहन कर लेती हो ये सब ?रंजना-तुम जैसे दोस्तों के सहारे... अब अगर तुमसे कहूं की मेरे शरीर की मालिश करदो, तो मना कर दोगे क्या ?रवि- कैसे कर सकता हूँ...
Sunday, November 16, 2008
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