Monday, November 24, 2008

रंगीला रतन- भाग-28

जब हम कुछ ग़लत निर्णय लेते हैं या फ़िर हमारे साथ कुछ होना होता है तो आत्मा के किसी कोने से इसका एहसास हो जाता है , इसके बावजूद हम उसको नजरअंदाज करते रहते हैं , किसी भी हालत में हम या स्वीकार नहीं करते की ऐसा भी हो सकता है... रमेश का भी वही हाल था... रागिनी की अजीब सी मांग ने उसको पशोपेश में उलझा दिया था... इस उलझन से निकलने की तरकीब सोचते-सोचते वह परेशान हो गया... तभे रागिनी ने उसको याद दिलाते हुए कहा-
-कहाँ खो गए ? जब प्यार के समंदर में गोता लगाने का समय हो तो ज्यादा सोचना -विचारना नहीं चाहिए...
रमेश- सोरी... मैंने यह सब सोचा भी नहीं था... मैं तोतुम्हारी सुन्दरता पर फ़िदा होकर शेर लिखने की कोशिश कर रहा था... अब आकर यह लगता है की शायर लोग किसी खूबसूरत लड़की को देखकर ही शेर लिखना सीखते होंगे... खासकर तुम्हारे होठ बेहद सुंदर हैं... इतने रसीले होठों की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी... ओह ...
रागिनी कहना तो और भी चाहती थी, मगर वह खामोश रह गयी... उसको पहले यह आभास हुआ था की कहीं रमेश बच्चे के बारे में तो नहीं सोच रहा है, लेकिन वह तो उसकी सुन्दरता के विषय में सोच रहा था... रमेश अब पूरी तरह से उसके साथ था... जोर-जोर से प्रहार कर रहा था... इसी कारण रागिनी गर्म आहें भर रही थी... रागिनी इन गुलाबी पलों को जी जान से जीना चाहती थी... वह मोहब्बत करने की कला में पारंगत थी... उस समय उन दोनों ने जवानी का जमकर मजा लूटा... जब वे दो जिस्म एक जान हुए तब जाकर एक दूसरे से अलग हुए... रागिनी को रमेश इतना भाया की वह उसको छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं थी... वह रमेश को बार-बार चूम रही थी... उन दोनों के संतुष्ट होने के बाद प्रभा ने कमरे पर दस्तक दी... रमेश ने उठकर दरवाजा खोला... प्रभा के होठों से मुस्कान नाच रही थी... उसने आते ही सवाल किया-
-कैसी हो रागिनी ? मैं समझती हूँ की रमेश ने तुमको निराश नहीं किया होगा ?
रागिनी- निराश तो नीचे अहं किया मगर बहुत सी शिकायतें हैं ...
प्रभा- क्या कहती हो ? मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ हुआ होगा ? रमेश के अन्दर की आग इसके चेहरे से साफ़ दिखाई देती है... मैं हर बात मान सकती हूँ, बस यही नहीं मानूंगी... कोई एक शिकायत ही बताओ...
रागिनी- सबसे पहली और महत्वपूर्ण शिकायत तो यही है की तुमने रमेश से पहले क्यों नहीं मिलवाया... मेरी जिन्दगी के कितने दिन रमेश के बिना ही बीत गए... क्या उन दिनों को वापस लौटा सकता है रमेश ?
खुशी के मारे रागिनी से लिपट गयी प्रभा... रमेश उन दोनों की इतनी खुशी का राज नहीं समझ पा रहा था... वह कुछ पूछ पाटा, इससे पूर्व ही प्रभा ने कहा-
-मेरी सबसे प्यारी दोस्त है रागिनी... इसकी खुशी ही मेरा असली मकसद था, वह पूरा हुआ तो फूली नहीं समा रही हूँ... मन को बहुत सुकून मिला है...

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