- अगर तुम कहो तो मैं उस बेवफा रमेश की गोली मारकर ह्त्या कर डालूँ... बस तुम्हारे आदेश की जरूरत है...
रंजना- नहीं रवि, मैं ऐसा नहीं करवा सकती... यह मेरे वश की बात नहीं है... मैं तो प्रेम की पुजारिन हूँ... प्यार करना मेरा धर्म है... जान लेना जल्लादों का काम होता है... मैं अपनी जान दे सकती हूँ मगर किसी की जान ले नहीं सकती... कुछ भी हो, मैंने कभी रमेश से प्यार किया था... उसी रमेश को मरवाने की बात मैं ख्यालों भी नहीं सोच सकती... मेरे सीने में भी दिल धड़कता है...
रवि- मैं समझ गया... इसका मतलब अब भी मन के किसी कोने में रमेश की छवि बसी हुई है...
रंजना- तुम व्यंग्य कर रहे हो ?
रवि- नहीं , मैं ऐसा नहीं कर सकता... मैं तो ये कह रहा हूँ की अगर प्यार अब भी बरकरार हो तो मैं रमेश को मनाकर ला सकता हूँ... वह दुनिया के किसी भी कोने होगा तो भी उसको ले आऊंगा...
रंजना- नहीं रवि, तुम बहुत भोले हो... तुम्हारा मन बेहद सुंदर है... तुम्हारी भावनाएं कोमल हैं... मैं भी कभी ऐसी ही थी... मगर दुनिया ऐसी नहीं है... दुनिया बड़ी तंगदिल है और संगदिल है... यह देखने में कुछ लगती है और सच्चाई बिल्कुल अलग होती है... क्या करें , कुछ कर भी नहीं सकते... चाहकर भी नहीं... सिवाय मरने के कोई राह नहीं सूझती... और मौत भी इतनी आसान नहीं...
रवि- जब तुम इतनी थकी-थकी और उदास बातें करने लगती हो तो मेरा मन भी दुखी हो जाता है... मुझे सटाकर पता नहीं तुमको कितना बड़ा सुख मिलता है...
रंजना- ओह, कैसी बातें हैं ये ? क्यों कहते हो ऐसी बात, जिससे की चोट सी लगती है... दिल तड़प उठता है...
रवि-उस दिन क्या हुआ जब तुम्हें रमेश ने बुलाया था और तुम उसके कमरे पर गईं थीं...
रंजना- रमेश के मन में पहले से ही चोर था... उसने मुझे बुलाने से पहले हियो एक जाल सा बुन रखा था... मैं उस सद्यन्त्र में फंसती हुई चली गयी... उस शाम उसने मुझे थोडी सी शराब पिलादी... मैं नशे में थी... मेरा सर घूमने लगा था... रमेश जो भी कहता , मैं चुपचाप मान लिया करती थी... मुझ पर जादू सा सवार था... मेरे दिल की हर धड़कन में रमेश बसा हुआ था.... रमेश ने मुझसे फ़िर जिद की थी-
- आज हम लोग सुहागरात मनाएंगे... आज इनकार मत करना वरना मेरा दिल टूट जायेगा...
रंजना- शादी से पहले कैसी सुहागरात ? कहीं तुमने ज्यादा शराब तो नहीं पी ली ...
रवि- ये सब पुरानी बातें हैं ... दकियानूसी बातें ... पुरानी बातें अंधेरे की और ले जाती हैं... आज इंसान चाँद की सैर कर रहा है और हम बाबा आदम के जमाने में उलझे हुए हैं.... पढ़े लिखे लोग ही अगर पिछडी बात करने लगें तो नई क्रान्ति का क्या होगा ?
रंजना- लेकिन समाज ?
रवि- कौन से समाज की कहती हो ? यहाँ लोग अपने फायदे के लिए परिभाषाएं बनाते -बिगाड़ते रहते हैं...
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