Wednesday, November 26, 2008

भाग-30

इसी कारण रमेश ख़ुद को कमतर समझने लगा था... प्रभा उसको बार-बार मुबारकबाद दे रही थी... उसके गालों को सहला रही थी... उसके शरीर से वह इतने करीब से चिपकी हुयी थी की अगर रमेश थका हुआ नहीं होता तो अब तक वह गर्म हो गया होता... प्रभा कह रही थी-
- तो रागिनी को तुमने शीशे में उतार ही लिया ... अब तुम्हारे सुनहरे दिन शुरू हो जायेंगे ...
रमेश- इश्वर जाने, मेरे साथ क्या होने वाला है ? पता नहीं मैं किस उलझन में फंस गया हूँ... कहीं ऐसा तो नहीं की मजे-मजे में ही मुझे जिगोलो बना दिया गया है...
प्रभा - दोस्ती में ऐसा नहीं कहते... तुम रागिनी के ख़ास दोस्त बन चुके हो... वह तुमसे बच्चे की उम्मीद भी कर चुकी है... ऐसे में तुम अपने आपको जिगोलो की बजाय उसका पति क्यों नहीं मानते ?
रमेश - क्योंकि पति भाड़े पर नहीं मिलते ... पति सिर्फ़ मनोरंजन की चीज भी नहीं होते...
प्रभा- ओह, कमाल करते हो रमेश... रागिनी की बात का बुरा मान रहे हो... वह सिर्फ़ पति को ही नहीं बल्कि जिन्दगी को भी मनोरंजन का साधन मानती है... सबका नजरिया अलग होता है... जिन्दगी को देखने का भी और जिन्दगी को जीने का भी... तुम बिल्कुल जुदा सोच रखते हो, मेरी उससे भी जुदा और किसी और की सबसे जुदा हो सकती है... इसमें बुरा मानने का कोई अर्थ नहीं होता... अगर आगे बढ़ना है तो दोस्तों से नए-नए आइडिये सीखने पड़ते हैं, उनकी बात माननी पड़ती है...
रमेश- मैं अपनी जान भी देने को तैयार हूँ , मुझे कोई एतराज नहीं है...
प्रभा- फ़िर दिक्कत कहाँ हैं ? तुम खुशनसीब हो जो रागिनी जैसी दोस्ती मिली है... तुमने तो देखा ही होगा की सड़कों पर कितने ही जवान लड़के घुमते रहते हैं...और उन्हें कोई नहीं पूछता ... बेचारे कितने ही तो वैश्यालय में जाकर अपने तन की आग बुझाते हैं और बहुत से तो बलात्कार जैसा अपराध ही कर डालते हैं... प्रणय क्रीडा एक प्राक्रतिक जरूरत है, इसको कोई नकार नहीं सकता... इधर-उधर गंदगी में मुह मारकर सेहत, समय और पैसा खर्च करने से तो यही बेहतर है की हम जैसे साफ़ सुथरे ,सेहतमंद और दौलतमंद लोगों से ही सम्बन्ध बना लिया जाएं... इसमें तुम्हें कहीं से भी घाटा नहीं हो रहा ... फायदा तुम्हारा ही है ...
रमेश- मैं स्वाभिमान की बात कर रहा था... जब रागिनी मैडम ५०० का नोट देकर गईं तो नजरें नीचे झुक गईं... तब से लेकर अब तक मैं अपने आपको गुनाहगार समझ रहा हूँ
प्रभा - यह भी कोई बात हुई ? प्यार में इस तरह की भावनाएं नहीं रखी जानी चाहिए... प्यार कभी उंच-नीच नहीं देखता ... यह तो उस एहसास का नाम है जो सबसे पवित्र और हसीं होता है...
रमेश- तुमने तो मेरेजेहन को ही साफ़ कर दिया ... अब मैं अपने दिल पर बोझ नहीं रखूँगा...
प्रभा- मन में कोई और संदेह तो नहीं है ?
रमेश- अब कैसा संदेह ? अब तो बस प्यार के इस कारवाँ को आगे बढाना है ... क्या एक बार और प्यार करें ?
प्रभा- अब नहीं... कुछ जोश कल के लिए भी रहने दो...




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