लवगुरु, भाग-१७ , क्या इस तरह की कोई ट्रेनिंग भी आपकी दुनिया में डी जाती है कि पहले तो ऐसी कथा सुनाओ कि मर्द अपने आपको भूल जाएँ, आपकी अदाओं के सागर
में डूब जाएँ और इसके बाद जब चाहो आप उन्हें उनके औकात बतादो . मेरे साथ भी तो यही हुआ. पहले तो ऐसी बातें बतलाईं कि दिल दीवाना हो गया. तुम्हार यह हसीन
चेहरा हमेशा के लिए मेरी आँखों की गहराइयों में समा गया, तुम दिल की रानी बन बैठीं और जब मेरा दिल तुम्हारे लिए धड़कने लगा तो तुम्हारे भी नखरे बढ़ने लगे हैं. जब मैं
कहता हूँ कि बात अगर पैसों की है तो दोगुने ले लों, अगर भरोसा नहीं है स्टेम्प पेपर पर लिख्वालो मगर हमारे साथ चलो तो चुप हो जाती हो .
डोली- मुझे वादे तोड़ने के आदत नहीं है, झूठ बोलना मेरे लिए विष पीने के सामान है . जब मैं इस ऑर्गनाइजेशन से एडवांस ले चुकी हूँ, यह वादा कर चुकी हूँ कि साल भर
तक मैं उनके आदेश का पालन करूंगी , वे मुझे जिस भी इंसान के पास भेजंगे , मैं खुशी-खुश अपना जिस्म सौंप दूंगी . अब अगर मैं आपको हाँ करती हूँ तो उनको बुरा लगेगा .
यह मेरी वादाखिलाफी है. मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ ? मैंने मुकर जाना नहीं सीखा. माफ कीजियेगा आपसे पहले मुझे इन लोगों ने ऑफर कर दिया है .
मुंशीजी- जों बुरे लोग हैं, जिनकी नीयत में खोट है आखिरकार उनसे वादाखिलाफी करना क्या बुरा है . गलत को गलत काम से ही काटा जा सकता है. जैसे कि लोहा लोहे को काटता
है . अगर इन जिस्म बेचने वालों को तुम इनकार कर देती हो तो यकीन मानो ये तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते. ये कुछ भी करने लायक नहीं है . झूठ के पैर नहीं होते .
डोली- ओके मेरे राजा. आओ तो सही.नाराज मत होना. कल क्या होगा, कौन जानता है . हम आज के बारे में बात क्यों नहीं कर सकते ? जों खुशियाँ हम आज लूट सकते हैं ,
उनको कल की किसी बात के लिए हम क्यों गंवाएं ? यह ठीक नहीं है . ऐसा नहीं होता कि कल के लिए हम अपने आज को भूल जाएँ . ज़रा मुस्कराओ तो सही .
डोली रूठे हुए मुंशीजी को मना रही थी . उसके दिल के तार झनझना उठे. प्यार की लहरें उसे अपने आगोश में लेने लगीं. वे सोचने लगे कि अगर उनकी प्रेमिका छबीली ने
इनकार भी कर दिया तो वे डोली के सहारे अपना जीवन स्वर्ग से भी बेहतर बना सकते हैं. डोली भी सुन्दर है, पढ़ी-लिखी समझदार लड़की है. उसके सामने तो छबीली भी कुछ
नहीं ठहरती है . छबीली की चढी हुई जवानी ने मुंशीजी को ऐसा दीवाना बनाया कि अब उनके ऊपर से छबीली का प्रभाव धीरे -धीरे कम हो रहा था और डोली के यौवन और कातिल
अदाओं का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा था. अब मुंशीजी कि समझ में ये बात आयी कि जिस छबीली के बिना वे एक पल भी जीने की कल्पना नहीं कर सकते थे, जिसे पाने के
लिए वे अपना सब कुछ दांव पर लगा सकते थे , उससे सुन्दर लड़किया भी दुनिया में माजूद हैं. फिर उसे वेटर के शब्द याद आने लगे , उसने कहा था कि छबीली से भी ज्यादा सुन्दर
माल चाहिए तो मिल जाएगा . तो क्या डोली से सुन्दर लड़कियां भी हैं ? तब तो उससे भी सुन्दर ही होंगी . इस तरह संसार में हर तरह के लोग मौजूद हैं. एक से बढ़कर एक. फिर
उन्हें ख़याल आया कि व्यर्थ ही वे एक दायरे में कैद हो रहे थे. बेकार ही रोजाना घुट-घुटकर मर रहे थे. अब उनके जीवन से अँधेरा छंटने लगा. आशा के दीप टिमटिमाने लगे. उनको
यह पक्का यकीन हो गया कि उन्हें उनका प्यार जरूर मिलेगा . वे चाहें तो बेहतरीन से बेहतरीन हसीना से वि९वाह रचा सकते हैं. पैसे के लिए कुछ लड़कियां अपना जिस्म तक
समर्पित करने के लिए तैयार हो जाती हैं, जैसे कि डोली ने वैश्या बन्ना स्वीकार कर लिया है, ऐसी न जाने कितनी ही मजबूर लड़कियां होंगी , जों सुन्दर होने के साथ-साथ सुशील
और समझदार भी होंगी . तब वे उनके साथ घर बसाने के लिए राजी क्यों नहीं हो सकतीं. उसको सोच में गुम देखकर डोली परेशान हो गयी , बोली-
-क्या बात है जान , क्या मेरी बातों का बुरा मान गए ?
मुंशीजी- अगर तुम्हारी बातों का बुरा मानेंगे तो जियेंगे कैसे ?
डोली- बहुत कम समय में आपने मेरे दिल को छू लिया है . आपके जाने के बाद कई दिनों तक अच्छा नहीं लगेगा .
मुंशीजी- मैं भी बहुत प्रेम करने लगा हूँ तुमसे . अभी तक कुंवारा हूँ और हमेशा के लिए इन जुल्फों के साये में क्षण गुजारना चाहता हूँ .
डोली- अगर मेरी मजबूरी नहीं होती तो निश्चित मानिए कि मैं हरगिज इनकार नहीं करती .
मुंशीजी- प्यार में पहले इनकार और फिर इकरार होता है .
डोली- मैं तो पहले आपको दिल से अपना मान चुकी हूँ.
मुन्शीजी- तो फिर क्या समझूं ?
डोली- आइये आपके होठों को चूम लेती हूँ.
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