Saturday, August 7, 2010

लव गुरु , भाग-०१

उसका मादक यौवन बड़ा रसीला था. सीने के उभार तो ऐसे थे जिन्हें कोई एक बार देखले तो दीवाना हो जाए, होठों से जैसे शराब के जाम छलकते थे, आँखें ऐसी जिनमें सागर भी डूबने को मचल उठे, ज़ुल्फ़ ऐसी कि घटाएं भी शरमा जाएँ और जवानी ऐसी कि स्वर्ग की अप्सरा भी पनाह मांगे, जुबान ऐसी कि शहद की मिठास भी फीकी पड़ जाए. उस अलबेली हसीना का नाम था छबीली . लेकिन मौहल्ले के ज्यादातर लोग उसको छमिया कहकर ही पुकारते थे. उम्र कि कमसिन ही थी मगर हर समय उसके इर्द गिर्द भँवरे मंडराते ही रहते थे. नौजवान तो नौजवान , बूढ़े भी उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे. वह अजूबा थी. रईस लोगों ने छमिया के करीब आने के लिए उसके किसान पिता को मुंह माँगा कर्ज दे रखा था, वह भी कम ब्याज पर . मुंशी रामलाल तो अपने सगे भाई पर भी ब्याज कि रकम नहीं छोड़ते थे मगर छमिया के पिता से कभी ब्याज कि बात तक नहीं की. न मांगने पर भी वे हजार दो हजार रुपयों का कर्ज दे दिया करते थे. उनकी बड़ी दूकान थी , वहाँ पर हर चीज मिलती थी, मगर छमिया के लिए किसी चीज का कोई मोल नहीं था. छमिया जब भी दूकान पर जाती तो मुंशी रामलाल उसे बडी हसरत से निहारते , बड़े चाव से बुलाते. खानेपीने की किसी भी चीज पर मानो छमिया का जन्मसिद्ध अधिकार था. वह कुछ भी लेकर जा सकती थी, उन चीजों के पास न तो उससे नकद लिए जाते थे और न ही उसके पिता के एकाउंट में ही लिखे जाते थे. वह हमेशा मुस्कराते हुए दूकान में प्रवेश करती थी और मुंशीजी के सीने पर बिजलियाँ गिराकर चली जाती थी. राम्लाम नाम के ही मुंशी थे, वरना वे इस दूकान के मालिक थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. उनकी शादी भी कम उम्र में ही हो गयी थी और फिर जल्द ही उनकी पत्नी का देहांत भी हो गया, इसके बाद उन्होंने फिर कभी विवाह नहीं किया. अपनी ही दूकान में उन्होंने अपने छोटे भाई को भी रख लिया था, देखा जाए तो सब संपत्ति उसके भाई के लिए ही थी. मगर उम्र के ५० बसंत देख चके मुंशी रामलाल के दिल में अब कुछ-कुछ होने लगा था. छमिया ने उनके मस्तिष्क में भूचाल सा मचा दिया, चाहकर भी वे अपने दिल से उस चंचल सूरत को निकाल नहीं पा रहे थे. उस दिन जब छमिया अपनी किसी गिरी हेई चीज को उठाने के लिए नीचे झुकी थी तो उसके यौवन उभार देखकर मुंशीजी का कलेजा मुंह को आ गया, मन में चिंगारी सी उठने लगीं, जी में आया कि आगे बढ़कर छमिया को अपने गले से लगा ले , उसकी अदाओं ने मुंशीजी को दीवा बना डाला था , सोचने लगते कि इस दौलत का आखिर क्या होगा. उन्होंने अथाह संपत्ति कमाकर रखी थी. इतनी दौलत में से अगर कुछ हजार या लाख खर्च भी हो जाएँ तो क्या फर्क पड़ता है. मगर छमिया जैसी हूर परी अगर उनके जीवन में आ जाती है तो जी ते जी स्वर्ग पाने जैसा सुख मिल सकता है. यह मानव तन पाने का सौभाग्य सफल हो सकता है, वरना ऐसे ही आये और ऐसे ही चल पड़े जैसी स्थिति हो जायेगी, फिर उनको ख्याल आता है अपनी उम्र का . वे ५० के और छमिया मुश्किल से १६ साल कि. कितना अंतर है उम्र में. फिर वे गीत गुनगुनाने लगते. ना उम्र कि सीमा हो , ना जन्म का हो बंधन , जब प्यार करें दो दिल तो देखे केवल मन. यही रीत बनाकर तुम मेरी रीत अमर कर दो. होठों से छू लो तुम , मेरे गीत अमर कर दो. और फिर अगले ही पल उनको लवगुरु कि याद आयी, लव गुरु उर्फ बटुकनाथ चौधरी ने जैसे अपनी छात्रा के साथ विवाह रचाकर मिसाल पेश कि, वैसे वे भी तो कर सकते थे. आँखें अब भी वे पूरी तरह फिट हैं और छमिया को बेड पर पूरा सुख दे सकते हैं.

रामलाल दुविधा में हैं . न तो अपनी मन पसंद की लड़की से प्यार का इजहार कर पाते हैं और ना ही कहे बिना रहा ही जाता है. ५० की उम्र को गाँव में ऐसा समझा जाता है जैसे कि इंसान अब गया कि टब गया . ३५ से ऊपर होते ही उसे बुड्ढे के विशेषण से नवाजा जाता है. रामलाल की आशा का दीप अब कोई और नहीं बल्कि बटुकनाथ चौधरी उर्फ लव गुरु थे . वे लवगुरु का अपना असली प्रेरणादायक और गुरु समझते थे.

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