Wednesday, August 11, 2010

लव गुरु भाग-५

कल्पना लोक भी बड़ा अजीब होता है. इंसान अचानक बादशाह हो जाता है और पूरी दुनिया उसे अपने क़दमों में नजर आने लगती है. मुंशीजी भी इस वक्त कल्पना लोक में विचरण कर रहे थे. उनका साथ दे रहीं थीं , हूर परी छबीली . वह छबीली जिस पर वे दिलो जान से न्यौछावर थे. जिसकी एक झलक पाने के लिए घंटों बिगाड़ दिया करते थे, जिसे वे तो मन ही मन प्यार करते थे मगर वह भी उन्हें घास डालती है कि नहीं , पता नहीं. उसी छबीली को अपनी बांहों में समेटे वे ख्यालों की नगरी में उससे प्रेम कर रहे थे. धीरे-धीरे उन दोनों के बदन से कपडे हटते जा रहे थे. और देखते ही देखते कुछ समय में ही वे दोनों बिलकुल निर्वस्त्र हो गए. मुंशीजी के कदम काँप रहे थे, हाथों में भी कंपन हो रहा था, ऐसा लगता था जैसे वे छबीली का जिस्म नहीं बल्कि दुनिया की सबसे अमूल्य धरोहर को स्पर्श कर रहे हों. दिल में कई तरह के प्लान थे. दिलो -दिमाग में घंटियाँ सी बज रही थीं. छबीली मदमस्त होकर उसकी निहार रही थी. उसकी आँखों में लाल-लाल डोरे तैर रहे थे, ऐसा लगता था जैसे उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे हों. मुंशीजी ने ध्यान से देखा, सचमुच वे अंगारे ही तो थे. वासना के दहकते हुए सुर्ख लाल अंगारे. वह उनकी तरफ ऐसे देख रही थी मानो सदियों की प्यासी , तडपती मछली समुन्दर की ओर निहार रही हो. वह कामुक बातें कर रही थी.मुंशीजी के हर सवाल का जवाब दे रही थी. मुंशीजी के हाथों को बार-बार अपने सीने पर रखकर यह संकेत देने का प्रयास कर रही थी कि जिसे वो नाजुक कली समजह रहे हैं, वही नाजुक कली खुद ही मसलवाने के लिए बेताब है. वह खुद चाहती है कि इस वक्त मुंशीजी उसके बदन को अच्छी तरह से निचोड़ दें, मसल दें, दबा दें. उसके जिस्म से आग की जों लपटें निकल रही थीं, उनसे मुंशीजी भी झुक्लासने लगे. उन्होंने अपने खास अंग जब छबीली की जाँघों से टच किया तो वह उछल पडी. लगभग चीखते हुए बोली-
-उई मा, इतना बड़ा, सख्त . मर जौंगेई मैं तो . मुझे जाने दीजिए. अभी नहीं फिर किसी दिन सही.
मुंशीजी- मूड आज हो रहा है, माहोल आज है और तुम कहती हो कि फिर किसी दिन. यह सिर्फ देखने में हे खतरनाक लगता है, जब इसके साथ खेलोगी तब मानोगी कि हाँ कोई चीज है. इसे एक बार प्यार करके तो देखो, मेरा भरोसा करो, फिर तुम हमेशा के लिए इसकी दीवानी हो जाओगी. तुम्हारी आँखों में कामवासना के जों लाल-लाल डोरे दिख रहे हैं न, वे इन्हीकी चाहत रखते हैं. इसके बाद आग की भट्टी की तरह जलता हुआ तुम्हारा यह जिस्म बिलकुल शांत हो जाएगा. मेरा यकीन करो . आह ... देखो अब न तो खुद तद्पो और न मुझे तड़पाओ.
छबीली- - आप मुझे बहका तो नहीं रहे हैं. देखते ही ऐसा लगता है अजिसे कोई काला नाग फन फैलाए हुए खड़ा हो. मैं जाना चाहूंगी. भले ही मेरा बदन जलता रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता. आँखें सुलगती रहें, कोई दिक्कत नहीं है. में आँखों वाली दवा खरीद लूंगी. उससे आराम हो जाएगा.
मुंशीजी- ऐसा नहीं होता मेरी जान. अगर दवा से इसका इलाज होता भला अब तक सबका इलाज न हो चुका होता. इसका तो अब बस एक ही इलाज है. आराम से टांगें साइड में करो, थोड़ी देर तक रुको और फिर देखो मैं कैसे आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हें मस्ती के समुन्दर में गोते लगवाता हूँ. जिसे तुम बड़ा और डेंजर बता रही हो , कुछ देर के बाद कहोगी कि यह तो बहुत प्यारा और छोटा है .
छबीले- आप मुझे बहका रहे हैं. देखो, यह मेरा पहला चांस है . मैंने आज तक कभी कसी मर्द के साथ इस तरह के करीबी सम्बन्ध नहीं बनाए. आज अगर कुछ हो गया तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी. अगर आप मेरे करीब आये तो डॉक्टर को बुलाने की नौबत आ जायेगी.
मुंशीजी- ये क्या कह रही हो, क्या मैं बलात्कारी हूँ. चोर उचक्का हूँ, आशिक आवारा हूँ ? अरे मैं चाहता हूँ तुम्हें. बेहद प्यार कर्ता हूँ तुमसे जान छिडकता हूँ तुम पर . एक पल भी रह नहीं सकता तुम्हारे बिना. मैं चाहता हूँ कि तुम्हें दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करू. मैं तुम्हें तकलीफ देने नहीं बल्कि सुख और आनंद देने कीइच्छा रखता हूँ. तुम मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश क्यों नहीं करतीं ?गलियों में घूमने वाले लोफर और प्यार करने वालों में जमीं आसमां का फर्क होता है . उसे महसूस किया जा चाहिए.
छबीली- चाहे आप जैसा चाहने वाला हो या फिर गलियों में लड़कियों पर फिकरे कसने वाले लोफर , सबकी चाहत तो एक ही होती है न, जिस्म को हासिल करना . आप भी वही चाहते है. फिर कहाँ हुआ फर्क ?












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