-उई मा, इतना बड़ा, सख्त . मर जौंगेई मैं तो . मुझे जाने दीजिए. अभी नहीं फिर किसी दिन सही.
मुंशीजी- मूड आज हो रहा है, माहोल आज है और तुम कहती हो कि फिर किसी दिन. यह सिर्फ देखने में हे खतरनाक लगता है, जब इसके साथ खेलोगी तब मानोगी कि हाँ कोई चीज है. इसे एक बार प्यार करके तो देखो, मेरा भरोसा करो, फिर तुम हमेशा के लिए इसकी दीवानी हो जाओगी. तुम्हारी आँखों में कामवासना के जों लाल-लाल डोरे दिख रहे हैं न, वे इन्हीकी चाहत रखते हैं. इसके बाद आग की भट्टी की तरह जलता हुआ तुम्हारा यह जिस्म बिलकुल शांत हो जाएगा. मेरा यकीन करो . आह ... देखो अब न तो खुद तद्पो और न मुझे तड़पाओ.
छबीली- - आप मुझे बहका तो नहीं रहे हैं. देखते ही ऐसा लगता है अजिसे कोई काला नाग फन फैलाए हुए खड़ा हो. मैं जाना चाहूंगी. भले ही मेरा बदन जलता रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता. आँखें सुलगती रहें, कोई दिक्कत नहीं है. में आँखों वाली दवा खरीद लूंगी. उससे आराम हो जाएगा.
मुंशीजी- ऐसा नहीं होता मेरी जान. अगर दवा से इसका इलाज होता भला अब तक सबका इलाज न हो चुका होता. इसका तो अब बस एक ही इलाज है. आराम से टांगें साइड में करो, थोड़ी देर तक रुको और फिर देखो मैं कैसे आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हें मस्ती के समुन्दर में गोते लगवाता हूँ. जिसे तुम बड़ा और डेंजर बता रही हो , कुछ देर के बाद कहोगी कि यह तो बहुत प्यारा और छोटा है .
छबीले- आप मुझे बहका रहे हैं. देखो, यह मेरा पहला चांस है . मैंने आज तक कभी कसी मर्द के साथ इस तरह के करीबी सम्बन्ध नहीं बनाए. आज अगर कुछ हो गया तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी. अगर आप मेरे करीब आये तो डॉक्टर को बुलाने की नौबत आ जायेगी.
मुंशीजी- ये क्या कह रही हो, क्या मैं बलात्कारी हूँ. चोर उचक्का हूँ, आशिक आवारा हूँ ? अरे मैं चाहता हूँ तुम्हें. बेहद प्यार कर्ता हूँ तुमसे जान छिडकता हूँ तुम पर . एक पल भी रह नहीं सकता तुम्हारे बिना. मैं चाहता हूँ कि तुम्हें दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करू. मैं तुम्हें तकलीफ देने नहीं बल्कि सुख और आनंद देने कीइच्छा रखता हूँ. तुम मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश क्यों नहीं करतीं ?गलियों में घूमने वाले लोफर और प्यार करने वालों में जमीं आसमां का फर्क होता है . उसे महसूस किया जा चाहिए.
छबीली- चाहे आप जैसा चाहने वाला हो या फिर गलियों में लड़कियों पर फिकरे कसने वाले लोफर , सबकी चाहत तो एक ही होती है न, जिस्म को हासिल करना . आप भी वही चाहते है. फिर कहाँ हुआ फर्क ?
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