रंजना- वाह, बहुत कम वक्त में तुमने इतनी ज्यादा तरक्की करली ? मेरे ख़याल से तुम्हारा क्रेज विदेशी महिलाओं में ज्यादा होगा , अगर यहाँ होता तो सम्भव है की हमारी मुलाक़ात भी किसी दिन होटल में हो जाती... फ़िर क्या हुआ ? उसके बाद फ़िर तुम्हें कभी अना मिल पाई की नहीं ? क्या उसने तुम्हारे साथ कभी बदसलूकी नहीं की ?
विनीत - बदसलूकी , मतलब मारपीट तो कभी नहीं की लेकिन उसने अपने तरीके से मेरे जिस्म का खूब इस्तेमाल किया... काम क्रीडा करने का उसका अंदाज अलग था... वह हर तरीका इस्तेमाल करती थी... जिस तरह वह रुपये खर्च करती थी, उसी प्रकार सेवा भी लिया करती थी... उसका प्यार करना का, सोचने का और जिन्दगी जीने का बिल्कुल अलग अंदाज था... वह बेहद कामुक थी... रात भर नहीं सोने देती थी... उसने मुझे पहले ही कह दिया था की उसको संतुष्ट करना हर मर्द के वश की बात नहीं है...वह मेरी मर्दानगी से खुश थी और मैं अपनी फीस से , तुम सोच रही होंगी की जब मैं इतना पैसा कमा रहा था तो शारीक के घर पर नौकर बनकर क्यों रह रहा था , इसका कारण ऐसा था की मैं इस शहर में नया था ... अगर कहीं बाहर रहता तो मुझे परेशानी हो सकती थी... मुझे गुंडों का डर था ... पुलिस का भी डर था... अगर पुलिस के हाथ लग जाता तो पैसे का क्या ब्योरा देता , डर था की कहीं वे किसी चोरीके केस में न फंसा डाले...
रंजना- रुपयों को तो बैंक में भी दाल सकते थे...
विनीत- उसके लिए बैंक में खाते की जरूरत होती है... बिना यहाँ के राशन कार्ड और अन्य सबूतों के मैं खाता नहीं खुलवा सकता था... यहाँ कोई भाड़े पर जल्दी से घर भी नही देता... बड़ी मुश्किल है...
रंजना- हाँ , वो तो है... यह जिस्म का चस्का ऐसा होता है की जिसे एक बार लग गया ,फ़िर वह bardaasht नहीं कर सकता... उसको हर जगह औरत ही औरत नजर आती है...
विनीत -हाँ ये बात सही है, यह चस्का बहुत बुरा है... तुम सच मानो तो मैं कहता हूँ की तुम्हारे सिवाय कभी कोई लड़की मेरे दिल में घर नहीं कर पाई ... उनके साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के बावजूद भी ....
रंजना- ये बात कुछ गले नहीं उतर रही, ऐसा कैसे हो सकता है ?
विनीत- मैं ख़ुद भी हैरान हूँ, हो सकता है पहले प्यार को भुलाना मुश्किल हो, तुम मेरी पहली मोहब्बत हो... मैंने तुमसे पहले किसी लड़की से कभी प्यार नहीं किया ....मैंने सुना है की कोई किसी को भी भुला सकता है, मगर पहला प्यार उसे आख़िरी साँस तक याद रहता है... मुझे लगता है की मैं तुम्हें मौत के बाद भी नहीं भुला पाऊंगा.....
रंजना- आह...... कितना अच्छा लग रहा है यह सुनना ... इन्हीं शब्दों को सुनने के लिए मेरे कान कबसे तरस रहे थे... अब मेरे कलेजे पर बहुत ठंडक पड़ी है... आत्मा खुश हो गयीं हैं...
विनीत- अभी तो तुम्हारे हर अंग को खुश करने की बारी है... खूब मजा दूंगा...जिगोलो बन्ने से यह फायदा तो हुआ की खूब संतुष्ट करने का फार्मूला मिल गया है...
रंजना और भी ज्यादा
Sunday, April 5, 2009
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