Tuesday, April 21, 2009

तड़प, भाग-12

आनंद की कोई सीमा नहीं रही... उसका आक्रमण बेहद कष्टप्रद था, तन को दुखाने वाला... मगर साथ ही मन को बहाने वाला... जब वह शक्ति का इस्तेमाल करता तो वह सिसिकियाँ भरने लगती , इसके बावजूद भी उसने दीपू को ज़रा भी ढीला नहीं छोड़ा, बल्कि वह उसे अपनी तरफ़ खीच लिया करती थी... उससे सत्कार वह और भी मगन हो जाया करती थी... हांलाकि थोड़े से दर्द का प्रदर्शन करना भी नहीं भूलत, उसे मालूम था की वह आखिरकार एक महिला है और महिला होने के नाते वह लोक लाज का प्रदर्शन करना भी नहीं भूली , इससे दीपू को भी लगा की वह कोई ख़ास लड़की है, वैसे वह ख़ास तो थी ही... हाई-फाई काल गर्ल थी... बहुत कम लोगों के साथ वह हम बिस्तर हुआ करती थी...और जिसके sath भी हमबिस्तर हुई, वही फ़िर उसका हमेशा के लिए mureed बन जाया करता था... दीपू ही एक ऐसा इंसान था जिसे पाकर वह ख़ुद ही उसकी दीवानी बन गयी... उस रात उन लोगों ने खूब सुख भोग, दीपू नया लड़का था... वह उत्साही और जोशीला था... उसने अपने मन से खूब जोर लगाया , इसका फायदा भी दीपू को मिला... शैली उसकी तारीफ़ करते हुए बोली-
- मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं, अगर तुम बड़े कलाकार बन जाओ तो इस नाचीज को मत भूल जाना... मैं इतना कर सकती हूँ की जब तक तुम गर्दिश में हो तब तक मेरी सेवायें मुफ्त में ले सकते हो... मैं अपनी बड़ी से बड़ी मीटिंग भी छोड़ सकती हूँ, आराम से तुम्हारे पास आ जाउंगी...
दीपू-लेकिन मेरे पास ऐसा क्या है, कुछ भी तो नहीं...
शैली- हीरे की परख जौहरी ही जान सकता है... तुम्हारे पास जो खजाना है, उससे कोई भी लड़की निहाल हो सकती है... जीवन भर में जितने सुख नहीं मिलते, उतने सुख तुम एक मुलाक़ात में ही दे सकते हो...
दीपू- आपके मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर मैं खुश हूँ, अगर मुझे कोई बड़ी फ़िल्म मिली तो निश्चित रूप से मैं तरक्की करूँगा... और अगर सफल हो गया तो सबसे पहले तुम्हारे पास आउंगा...वहाँ पर मैं तुम्हें हमेशा याद रखूँगा... जब मेरे पास पैसे आ जायेंगे तो मैं एक दिन तुमसे कहूँगा की अब यह गंदा काम रहने भी दो, तुम्हारे सब खर्चे मैं वहां करता हूँ, तुम बस घर पर आराम करो...
शैली- सच ? ये क्या कह रहे हो तुम ? कोई भी मर्द जब मेरे पहलू में होता है तो वह मुझसे ऐसी ही बात करता है... लेकिन सुबह जाते ही वह सब भूल जाता है... फ़िर उसे मान सम्मान याद आता है, समाज के रीति रिवाज याद आते हैं, परिवार की परम्पराएं याद आती हैं और फ़िर वह सब बातों को दरकिनार कर देता है... फ़िर लोग हमको वैश्या कहकर bulaate हैं... hamaare काम को ग़लत bataate हैं... तुमने कभी एक बात sochi है?
दीपू - कौन सी बात है शैली ?
शैली-लोग हमसे घरना करते हैं, हमें बदनाम समझते हैं... इसके बावजूद भी वे हमारे पास आते हैं, हमसे प्यार करते हैं और हमारे बिना जी भी नहीं सकते...
दीपू- बात तो पते की है, लेकिन यह बात पूछे कौन और किस्से ?
शैली- मेरे पास ऐसा कोई न्ग्राहक नही आया जिसने सहानुभूति बटोरने के लिए मुझसे शादी की इच्छा नहीं जताई हो... साथ ही उनमे से ऐसा कोई माई का लाल नहीं ने इकला जो मुझे डोली में बिठाकर ले गया हो...
दीपू-जोडियाँ यहाँ थोड़े ही बंटी हैं शैली... ये तो ऊपर ही तैयार हो जाती हैं...
शैली- इन सब खोखली बातों मुझे भरोसा नहीं है...मैंने अपना कार्ड तुम्हें दे दिया है... मेरी जब जरूरत महसूस करो मई हाजिर रहूंगी...
दीपू- ठीक है, मैं भी तुम्हारे सेवा करके ख़ुद को खुशनसीब समझूंगा... तुमने जो प्यार दिया उसके लिए आभार

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