Friday, April 10, 2009

तड़प

उसका शौक बड़ा अजीब था , काम न हो तो भी भी वह चर्च गेट से विरार जाने वाली लास्ट लोकल या फ़िर उससे पहली लोकल पकड़ता था... ट्रेन में सफर करने का उसे जबर्दस्त लगाव था... वह हमेशा महिला डिब्बे के पास वाला डिब्बा ही पकड़ता था... उसको सजी संवरी लड़कियों को निहारने में बड़ा मजा आता था... यहाँ तक की कभी कभी वह कई -कई दिनों तक एक विशेष समय वाली ट्रेन का विशेष डिब्बा ही पकड़ता था... उसका नाम तो दीप रत्न था मगर सब लोग उसे दीपू कहकर पुकारने लगे थे, उसके सफर के शौक को देखते हुए कुछ लोग उसको सैलानी भी कहने लगे थे... उसको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था की लोग उसको किस नाम से बुलाते हैं, उसे बस अपने सपनों से मतलब था... उसकी आवाज़ बड़ी सुरीली थी... उसका ख़याल था की अगर एक बार चांस मिल जाए तो वह अच्छे- अच्छे कलाकारों को फेल कर सकता है... बहुत कोशिश करने पर भी उसे कहीं अच्छा चांस नहीं मिल पाया था...दीपू हमेशा सपनों में खये रहना वाला प्राणी था... उसे लगता था की किसी दिन उसे कोई ऐसी हसीना टकराएगी की उसकी हर मुश्किल को आसान कर देगी... वह परियों जैसी सुंदर होगी, उससे खूब प्यार करेगी... उसके आने के बाद सभी मुश्किलों का नत हो जायेगा, उसके ट्रेन में ज्यादा सफर करने का एक ख़ास मकसद था , वह लड़कियों को घूरता रहता था... अगर कोई लड़की उसे देखकर मुस्करा गयी तो वह उसका पीछा करने लगता था, उससे बात करता , उसे पटाता और फ़िर मौज मस्ती करने के बाद अपने घर आ जाता... उसको माइनस पॉइंट ये था की की वह बहुत बड़ा कंजूस था... वह ऐसी लड़कियों के साथ मेल मोहबत करने में भरोसा रखता था जो की अपनी जेब से उसके खाने -पीने और रहने का खर्च उठा सके ... अगर कोई लड़की ऐसा करने में असमर्थता दिखाती तो वह फ़ौरन किनारा कर जाता था... इसी कारण उसे काफी दिनों से शिकार तलाश्जने में तकलीफ हो रही थी... वह दिखने में खूबसूरत था, पढा -लिखा था और शारीरिक रूप से ताकतवर था... और वह नियमित रूप से व्यायाम करना भी नहीं भूलता था... जब से कई दिनों तक भी कोई ख़ास लड़की नहीं मिली तो उसने लास्ट लोकल से सफर करने का मन बनाया... वह अँधेरी से ट्रेन में चढ़ गया... जनरल डिब्बे में दो वृद्ध ऊंघते दिखाई दिए, वह गेट के पास आकर खड़ा हो गया... तभी उसकी आंखों में चमक दिखाई दी... एक खूबसूरत लड़की दौड़ती हुई डिब्बे की तरफ़ बढ़ रही थी... ट्रेन रेंगने लगी, लड़की ने भी अपनी स्पीड बधादी, दीपू ने अपना हाथ बढ़ा दिया, उस लड़की ने उसका हाथ थाम लिया... अगले ही झटके में वह लड़की ट्रेन में चढ़ गयी... उसकी जुल्फे घनी काली थीं ... दीपू ने महसूस किया की वह हसीना कुछ लड़ खडा रही थी, दीपू का समझते ज़रा भी देर नहीं लगी की वह शराब के नशे में थी... उसकी जुबान भी कुछ चुगली कर रही थी... उसने थोड़ा सा हकलाते हुए पुछा-
-आप कैसे हैं ?
दीपू- मैं तो अच्छा हूँ पर आप कुछ ठीक दिखाई नहीं देतीं ?
लड़की- मेरा नाम शेली है, आपका बहुत -बहुत आभार ..... आपने बहुत सही समय पर हाथ दिया...
दीपू- इसमे आभार की क्या बात है, यह तो मेरा फ़र्ज़ था...



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