दीपू- यह फंदा कुछ समझ में नहीं आया... खोपडी के ऊपर होकर गुजर गया...
शैली- मैं जानती हूँ तुम्हारा दिमाग जहाँ काम कर रहा है... तुम मस्ती के मूड में आ चुके हो... पहले नित्य कर्म कर लो, चाय नाश्ता कर लो , उसके बाद फ़िर देखेंगे ....
दीपू- अभी भी नजर हटाने का दिल नहीं करता , बाद की बात अलग है... मुझे कुछ भी नहीं दिख रहा, सिवाय तुम्हारे...थोडी बहुत जो नींद आई है, उसमें भी तुम ही तुम अजर आती रहीं...
शैली- aashiki की बात कर रहे हो, सुना नहीं है ,इश्क इंसान को निकम्मा बना देता है...
दीपू- ना मामा से काना मामा ही सही... अभी तो कुछ नहीं है ....तुम्हारी मेहरबानी से कुछ तो बन जाऊँगा... इन झील सी गहरी आंखों में डूब जाना चाहता हूँ,॥
शैली- रहने भी दो, क्यों बुझती आग को हवा देती हो , चिंगारी फ़िर भड़क उठेगी... बड़ी मुश्किल संभाला है दिल ...
दीपू- इस बेचैनी का राज जानकर रहूँगा मैं... आख़िर मोहब्बत के नाम पर तुम्हें इतनी तकलीफ क्यों होती है ? तुम तड़प क्यों उठती हो ? इसकी वजह जो भी हो , मगर ठीक नहीं है...
शैली- छोडो भी दीपू , यह प्यार मोहब्बत की बातें रहने दो... मौज मस्ती करो और अपना काम देखो...
दीपू- मैं मानने वाला नहीं हूँ... जिद्दी हूँ, जो ठान लिया सो ठान लिया...
शैली- ओह, जख्मों पर नमक छिड़कना चाहते हो ? क्या मिलेगा तुम्हें ऐसा करके ?
दीपू- ये इल्जाम है मुझ पर... मैं ऐसा कोई काम कैसे कर सकता हूँ जिससे तुम्हें परेशानी होती हो...
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