Monday, April 20, 2009

तड़प, भाग-11

आख़िर ऐसा कौन सा जादू है जो इंसान को दीवाना बना देता है, अपने आप से भी बेगाना बना देता है... लोग इसके लिए घर बार त्याग देते हैं, ईमान -धर्म त्याग देते हैं... कत्ल तक कर डालते हैं... अब तुम्हीं कहो, फ़िर मैं इस आकर्षण में क्यों नहीं बंधता ... मैं भी मन में इस जिस्म को हासिल करने का अरमान पाल बैठा...
शैली- तुम मर्द हो और इस काम को मर्द नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ? अच्छा हुआ तुम यहाँ किसी काल गर्ल के चक्कर में नहीं पड़े वरना अनर्थ हो जाता .... इस शहर को नजदीकी से नहीं जानते तुम... पहले -पहले तो लोग शौक्वश बाजारू महिलाओं के चक्कर में पड़ते हैं, सिर्फ़ जिज्ञाशा शांत करने के लिए सोचते हैं की एक बार swaad चखने के बाद फ़िर कभी इस तरफ़ मुह नहीं करेंगे मगर फ़िर जल्दी ही सब कुछ छोड़कर उसीके जाल में उलझ्लकर रह जाते हैं... यह स्वाद ही ऐसा है... जिसके मुह को यह खून लगा उसे फ़िर दीं दुनिया का होश ही नहीं रहता...
दीपू- मेरे साथ भी यही तो हुआ... मैं इस मखमली बदन को पाने के लिए रात -बेरात घूमता रहा... मैंने अथक परिश्रम किया तब जाकर तुमसे मुलाक़ात हो पायी है... मैं बेशक नया हूँ मगर इसके लिए तुम्हें निराश होने की जरूरत नहीं है... मैं पूरी कोशिश करूँगा की हर तरह से तुम्हें संतुष्टि मिले...
शैली- मुझे भरोसा है मेरी जान... मैं पेशेवर हूँ, मुझे ज़रा भी हवस नहीं है... मैं तो हर काम पैसे के लिए करती हूँ, मुझे अब भूख नही रही... मेरी प्यास बुझ चुकी है... लेकिन , तुम्हारे अन्दर कुछ ख़ास है... तभी तो तुम्हें देखते ही मेरी इच्छाएं अनंत हो गयीं...
दीपू- मेरी खुशकिस्मती है, वरना मुझ जैसे करोड़ों सड़क पर घुमते हैं...
शैली- मेरा दिल जानता है की सच्चाई क्या है , मैंने न जाने कितने पुण्य किए होंगे तब जाकर तुम मिले हो...
उन दोनों की बातचीत भी चल रही थी और सिगरेट का धुआं भी उडाया जा रहा था... सिगरेट पीते ही दीपू की भावनाएं और भी भड़कने लगीं... वह अपने अंग को देखकर और भी रोमांचित हो रहा था... शैली की गोलाईयां उसकी धडकनों को बढ़ाने लगीं... दीपू आहिस्ता-आअहिस्ता अपने हाथों की रफ़्तार बढ़ाने लगा... यह उसके हाथों का ही कमाल था की शैली उसे अपनी तरफ़ खींचने लगी... कामवासना की आग दहकने लगी थी... मन के अन्दर अनंत हिलोरें उठने लगीं...दीपू उसके सीने को सहला रहा था... दोनों पूरी तरह निर्वस्त्र हो चुके थे... शैली का चिकना बदन दीपू के कब्जे में था... जब काम्वास्नाओं का ज्वालामुखी हद पार करने लगा तो उसने शैली के नाजुक अंगों को चूमना शुरू कर दिया... शैली भी अब दीपू के विशेष अंग को अपने होठों से स्पर्श करने लगी... जब तूफ़ान जोर पकड़ने लगा तो शैली बोली-
- अब बर्दाश्त नहीं होता दीपू... बहुत जोरों की भूख लगी है...
दीपू- मुझे भी यही आभास हो रहा है... मैं अपने आपको बेचैन पा रहा हूँ...
शैली-तुम्हारा साथ पाकर बहुत खुशी हो रही है... आह्ह्ह्छ ...
इसके बाद दीपू ने फायर करना शुरू कर दिया... शैली की आहें अब और भी तेज होने लगी थीं...










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