एक दूसरे का आभार प्रकट करने के बाद वे सो गए, शैली का डर ग़लत ही साबित हुआ... कोई पुलिसवाला वहां नहीं आया... उन्होंने अपने हिसाब से खूब सुख भोगा और फ़िर गहरी नींद की आगोश में सो गए... दीपू देर से जगह तो शैली वहाँ मौजूद नहीं थी, बेडपर वह अकेला था... उसके जिस्म पर कोई कपड़ा नहीं था , सिर्फ़ एक चादर उसके पास पड़ी थी... जल्दबाजी में वह नग्न अवस्था में ही सो गया था...शैली को न पाकर उसके होश उड़ने स्वाभाविक थे... उसके पास इतने रुपये नहीं थे की वह होटल का बिल चुका सके, अगर वह वहाँ पर किसी दोस्त को बुलवाकर पैसे देता तो इससे उसकी बदनामी हो सकती थी... उसने एक तौलिया से अपने संवेदन शील अंग को ढँक लिया और फ़िर टॉयलेट की तरफ़ भागा... वहाँ अन्दर से कुछ गुनगुनाने की आवाजें आ रही थीं... उसका फ़िर माथा ठनका , वह कौन हो सकती है ? उसने ध्यान से आवाज सुनी , यह शैली थी, उससे पहले उठकर स्नान कर रही थी... उसके धड़कते दिल को थोडी सी तसल्ली मिली... पूरी खुशी तब मिली जब शैली टॉयलेट से निकलकर बाहर आई... उसका चेहरा खिला हुआ था...वह अपनी काली जुल्फों से पानी झटकती हुई आ रही थी... दीपू को मौका चूकना अच्छा नहीं लगा... उसने शैली को अपनी बांहों में भरकर ऊपर उठा लिया और उसके होठों पर चुम्बनों की बौछार करने लगा... वह उसे उठाकर कमरे में नाचता फ़िर रहा था... शैली ने भी इन हसीं पलों को खूब इंजॉय किया ... दीपू का यह व्यवहार शैली की समझ से परे था... अब से pahle का उसका अनुभव बिल्कुल भिन्न था... इससे पहले तो वह जिस ग्राहक के साथ होटल जाती थी वह रात को तो जिस्मानी सुख भोगता था मगर फ़िर सुबह हुई तो ज्यादा बात भी नहीं करता था, फीस के रुपये और टिप देकर चलता बनता था, वह इतना ज्यादा जल्दबाजी में होता था मानो वह तुंरत नहीं निकला तो क़यामत आ जायेगी... उसको सोच में देखकर दीपू पूछने लगा-
-अब क्या हुआ ? क्या रात को मजा नहीं आया... मुझे लगता है शायद मैं तुम्हारी अग्नि परिक्षा में फेल हो गया हूँ...
शैली- तुम को सौ में से सौ नंबर मिले हैं... इतना ही जान लो की पिछले कई सालों से मैं इतनी खुश कभी नहीं हुई जितनी की अब हूँ...
दीपू- तुम तो कह रही थीं की इस खेल की तुम पक्की खिलाड़ी हूँ...
शैली- सीधे -सीधे कहों न की पेशेवर हूँ...झिझकते क्यों हो ? जो सच है , वो है...
दीपू- मैं इतना निष्ठुर और बदतमीज नहीं हूँ....मैं जानता हूँ हकीकत... हर किसीकी कोई न कोई मजबूरी होती है जो उसे इस दल दल में जाने के लिए बाध्य करती है... तुमने एक मशहूर शेर तो सुना ही होगा- कुछ तो मजबूरियां रही होंगी मेरे सनम की , यूँ ही तो कोई बेवफा नहीं होता...
शैली- वाह, तुम तो साहित्य प्रेमी निकले... मैं भी शेरो शायरी बहुत पसंद करती हूँ... मुझे तो पहले लिखने का भी शौक था, कई छोटी -मोटी पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छपती भी रही हैं...
दीपू- फ़िर क्यों छोड़ दिया ये सिलसिला ?
Wednesday, April 22, 2009
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