दीपू- जब तुम कह रही हो की सी ग्रेड की फ़िल्म बनाने वाला है तो तुम्हें उस पर इतना भरोसा कैसे है , वह तुम्हारी बात मान लेगा ? कहीं ऐसा तो नहीं की बेवजह चक्कर लगवाएगा ?
शैली- मान तो जायेगा , हर सी ग्रेड की फ़िल्म बनाने वाले इंसान एक तरह के नहीं होते, मगर उसकी परेशानी यही है की जब उसकी फ़िल्म बनेगी तभी रिलीज होगी... कभी- कभी उसे काफी समय लग जाता है... तब तक इन्तजार करना पड़ेगा.... वैसे उसकी एक खासियत बतादूँ की वे अह अपनी फ़िल्म को रिलीज जरूर करता है... बहुत जुगादी आदमी है... अब तक दर्जनों फिल्में बनाकर रिलीज कर चुका है... उसकी ख़ास बात यही है की वह अपनी हर फ़िल्म को बेच लेता है... चाहे कम थियेटर में चले लेकिन उसकी फ़िल्म चलती जरूर है...
दीपू- ठीक है, मैं उससे मिल लूँगा... क्या वह दे पाटा है तुम्हारी फीस ?
शैली- तुम जैसे लोग यहाँ कम नहीं है , सुबह से शाम तक उससे न जाने कितने टकराते हैं ?अगर एक भी मुर्गा उसे मिला तो वह सीधा शाम को हमें ही याद करता है , शराब और शबाब में ही इन लोगों का पूरा पैसा खर्च हो जाता है... मैं नहीं मिली तो किसी दूसरी को ढूंढता है, औरतों की कमी है क्या यहाँ ?
दीपू- ठीक कहती हो मुंबई और दिल्ली जैसे शहर में यही चीज सबसे सस्ती मिलती है और आसानी से उपलब्ध होती है... जेब में रुपये होने चाहिए...
शैली- दिखने में भले ही सीधे दीखते हो मगर तुम भी इतने नादाँ तो नहीं हो, गर्म गोश्त के बाजार में कभी न कभी तो तुमने भी दस्तक दी होगी... आख़िर नौजवान हो ... जज्बात तो मचलते ही होंगे...
दीपू- बहुत बार मचले हैं जज्बात ... मगर इनसे होता क्या है ? कभी जेब गवारा नहीं करती तो कभी हालात ...
शैली- मुझे नहीं लगता की हर जगह पैसे की ही पूछ होती है ? अगर तुम ख़ुद भी उल्टे पैसे लेने लगो तो कितनी ही दिलफेंक महिलायें तुम पर जान न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जायेंगी...
दीपू- अच्छा, आज मजाक उडाने के लिए मैं ही मिल रहा हूँ न... तुम्हारी इच्छा है कितना भी उडाओ...
शैली- हीरा ख़ुद नहीं परख सकता की उसकी कीमत क्या है , जौहरी ही यह बात जान सकता है...
दीपू- ठीक है मेरे प्यारे जौहरी जी, चलो तुम ही बतादो क्या है मेरी कीमत ? अगर मैं रोजाना तुम्हारे दरबार में हाजिरी लगाऊँ तो बताओ मुझे क्या कीमत मिलेगी ?
शैली- तुम ? क्या करोगे तुम मेरे यहाँ ?
दीपू- अभी तक तो तुम कह रही थीं की मैं बेशकीमती हूँ और अब मैं किसी काम के लायक भी नही रहा ...
शैली- मेरा अर्थ ये नहीं था दीपू... तुम तो मेरे प्यारे दोस्त बन चुके हो, तुमसे काम लुंगी मैं ?
दीपू- तो क्या तब खुश रहोगी जब मैं भूखा मर जाउंगा...
शैली- ऐसी नौबत आने से पहले तो मैं दुनिया से लड़ जाउंगी दीपू... ये क्या कहते हो ? क्या तुम्हें काम की इतनी ज्यादा जरूरत है... तब तो मैं आज रात को ही तुम्हारी मुलाक़ात एक एड एजेंसी के मालिक से करवा दूंगी... मुझे बहुत चाहता है... दो महीने से फोन पर फोन कर रहा है मुखे खंडाला अपने साथ ले जाना चाहता है मगर मेरे पास टाइम ही नहीं... एक बार वह मुझे एक विदेशी क्ल्यायंत की खिदमत के लिए लेकर गया था... तभी से दीवाना है मेरा... मैं तुम्हें उसकी कम्पनी में काम दिलवा दूंगी... उसके पास कई बड़ी कम्पनियों का काम है...
Sunday, April 26, 2009
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