Thursday, April 16, 2009

तड़प , भाग-७

मैंसुख देती हूँ, फीस भी उतनी ही वसूलती हूँ... ये तुम्हें क्या हो रहा हैतुम्हारा बदन क्यों सूखने लगा, अरे तुम्हारा तो चेहरा भी उतर गया है... क्या बात है ? ये फीस मैं तुमसे वसूलने नहीं जा रही हूँ... मैं तो ग्राहकों की बात कर रही हूँ... दोस्तों की नहींतुम ठहरे मेरे दोस्त... तुम्हें दोस्त का ओहदा दिया है...
दीपू- तुम मुझसे मजाक तो नहीं कर रहीं ? सबकुछ मुझे ग़लत दिखाई देता है...
शैली- क्या ग़लत है इसमे ? मैं या फ़िर मेरा काम ?
दीपू - जी नहीं , मैं तुम्हारी बात के बारे में कह रहा हूँ... तुम सचमुच खूबसूरत हो, साथ ही चरित्रवान भी लगती हो...मुझसे मजा लेने के लिए तुम इस तरह की बातें कर रही हो...
दीपू- ओह, ऐसी बात है क्या , तुम बहुत भोले हो, सचमुच सीधे हो... मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है... लेकिन आजकल सच्चाई को कोई जल्दी से मानता भी नहीं है... बड़ी मुश्किल है... अगर कोई चोर ये कहे की वह चोरी करता है तो किसी को कोई यकीन ही नहीं होगा, खैर, मेरी हकीकत यही है...
दीपू- मैं तो फ़िल्म जगत में प्रवेश करने के लिए संघर्ष करने वाला एक अदना सा इंसान हूँ, मैं ज्यादा फीस नहीं चुका सकता... वैसे मैं भी कोई साधू संत नहीं हूँ, तुम जैसी हसीनों के साथ बिस्तर पर खेल खेलना मुझे अच्छा लगता है, मैं अक्सर बार की किसी लड़की को लेकर मौज मस्ती करने बाहर भी जाता हूँ, लेकिन आज मैं घर से पैसे लेकर नहीं निकला ... हजार रुपये हैं , मगर इनसे तो खाने का इंतजाम भी नहीं हो पायेगा...
शैली- मैंने कहा ना , उसकी फ़िक्र मत करो... पैसे मेरे पास मौजूद हैं... मैं तुम्हें सिर्फ़ दोस्त समझ रही हूँ ... और मेरे साथ कुछ भी करना या नहीं करना यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर करता है... मैं तुम्हें आमंत्रित भी नहीं करुँगी और तुमसे इनकार भी नहीं करुँगी...
दीपू- यह अच्छा नहीं लगता की तुम अपने पेशे से समझौता करो, मैं तुम्हें बिना फीस दिए तुम्हारे साथ कुछ नहीं कर सकता... मेरा जमीर ऐसा करने के लिए मुझे गवाही नहीं देता...
शैली- तो ठीक है, जाओ किसी बैंक के एटीम से पैसे निकालकर ले आओ... मैं इन्तजार करती हूँ...
दीपू- एक ब्घंते की क्या फीस होगी ? अगर पहले ही बतादो तो ठीक रहेगा ...
शैली- वैसे तो एक रात का मेरा रेट एक लाख होता है, तुम दस हजार दोगे तो भी काम चल जायेगा...
दीपू-इतने पैसे तो मेरी बैंक में जमा नहीं है... हजार दो हजार की बात हो तो इंतजाम करुँ ?
शैली- ठीक है , फ़िर उधार लेलो, मैं कहाँ इनकार करती हूँ... कमाते -खाते दे देना...
दीपू- आख़िर तुम मुझे कर्जदार बनाने पर ही तुली हुई हो... ऐसी बात है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है... मगर पैसे मैं खाते -कमाते ही लौताऊंगा... यानी, दो चार महीने भी लग सकते हैं... इससे पहले जुगाड़ नहीं हो पायेगा,
शैली- मंजूर है, अब कुछ खाओगे या ऐसे ही आनंद लेना चाहोगे ?
दीपू- भूखे भजन न होय गोपाला , ये लो अपनी कंठी माला ... कहाँ है खाना ?
शैली- मेरे बैग में, मैं जानती थी की होटल के किचन बंद हो सकते हैं , इस्सिलिये मैंनेपार्सल रख लिया था...
जब उन दोनों का पेट भर गया तो पेट के नीचे की भूख भी परेशान करने लगी... दीपू को शैली का प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा था, उधार में मन पसंद लड़की के साथ सम्बन्ध बनाने की कल्प से ही उसे अद्भुत आनंद मिल रहा था...

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