- तुम्हारा ध्यान मेरी तरफ़ बिल्कुल नहीं है , ऐसा लगता है जैसे कहने और करने में कुछ फर्क नजर आ रहा है ?
- हाँ, नहीं-नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है... मगर , दिमाग थोड़ा भटक सा गया था...
विनीत- मेरे रहते हुए भी ? तुम मेरे पहलू में हो, मैं तुम्हें स्पर्श कर रहा हूँ और तुम मेरे साथ नहीं हो, क्या तबियत ठीक नही है ? हो सकता है मैंने कुछ ग़लत बात कहदी हो ?शायद तुम्हें भी आराम की जरूरत है... फ़िर सुबह बात करते हैं...चलिए , कपड़े पहनकर सो जाइए ...
रंजना- मेरी किस्मत में अब उजाला कहाँ , मेरे सूरज को ही अंधेरे ने अपनी आगोश में ढँक लिया है...
विनीत- ये थकी हारी बातें हैं या बहकी हुयी बातें ? मैं अनुमान नहीं लगा पा रहा हूँ...
रंजना- आज की रात को तुम सिर्फ़ बातों में ही बरबाद करने का इरादा रखते हो क्या ?अगर तुम्हारे प्यार की बरसात हो तब कोई अच्छी बात हो... इसके बिना कोई चैन नहीं है...
विनीत -तुम्हें मात्र बरसात की कुछ बूंदों की ही हसरत नहीं होनी चाहिए, खासकर तब, जबकि पूरा आसमान तुम्हारा पास हो और मेघ बरसाने वाले भी ख़ुद तुम्हारे गुलाम हों...
रंजना- मैंने सुना है की अकसर वही प्यासे रह जाते हैं जो दरिया के किनारे होते हैं....
विनीत- एक बात हमेशा सब पर लागू नहीं होती... सब पर अलग-अलग इफेक्ट होता है...
रंजना- अब तुम होशियार हो गए हो विनीत, यहाँ की हसीनों ने कुछ ज्यादा ही समझा दिया है...
विनीत- ओह, मजाक बना रही हो मेरा ? इसका मतलब ये हुआ की मैं पहले मूर्ख था, मुझे बात करने की इतनी भी समझ नहीं थी... या फ़िर जितनी समझ थी वह तुम्हारे मुकाबले कम थी ?
विनीत की तल्ख़ बात सुनकर रंजना को एहसास हुआ की उसकी जिबान से कुछ ग़लत बात निकल गयी है, वह विनीत को किसी भी हालत में नाराज नहीं करना चाहती थी... उसने रंजना के कहने से ही अपना नाम बदलकर रवि से विनीत रख लिया था... यह वही विनीत था जो रंजनको देवी से भी बढ़कर समझता था... उससे बेंतिहान मोहब्बत करता था ... यह अलग बात है की वह हालत का शिकार होकर महानगर की चकाचौंध में खो गया था, इस बात को वह छिपाना चाहता तो बड़े आराम से हजम कर जाता मगर वह इस विचार का व्यक्ति नहीं था... उसने रंजना की उस बात पर जयादा ध्यान दिया ,जिसमे उसने प्यार की बरसात की बात कही थी... वह रंजना पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... काम क्रीडा का असली सुख भोगने के लिए रंजना पहले से ही तैयार थी...
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