Sunday, April 26, 2009

तड़प भाग -17

उनके आस -पास भी कुछ जोड़े मौजूद थे, इस बात का एहसास उनकी गर्म आहों से हो रहा था... कोई दिखाई नहीं दे रहा था... वह स्थान इसीलिए गुप्त रखा गया था...शैली को यह विशेष रूप से पसंद था... सुरक्षा की भी गारंटी थी...दीपू ने मौका देखकर चौका लगाना शुरू कर दिया, उसने अपने ख़ास अंग पर शैली का हाथ रख दिया, शैली समझदार थी, उसने जब अपनी कलाकारी दिखाई तो दीपू दंग रह गया... वह उसके अंग से खूब प्यार करने लगी...दीपू की भावनाएं भड़कने लगीं... मन में चिंगारियां फूटने लगीं... यह बहुत नाजुक घड़ी थी... दीपू के मन में थोड़ा सा डर था... उसे आशंका थी की कहीं कुछ ग़लत न हो जाए , उसे सिर्फ़ शैली की तरफ़ से भय था... अन्य लड़कियों की तरह अगर वह भी बदल गयी और उसके ख़िलाफ़ बयान दे दिया तो उसे सजा होने से कोई नहीं बच्चा सकता... उसने यह बात शैली के सामने भी कहदी-
- अगर यहाँ कोई लफडा हुआ, पुलिस आ गयी और पूछताछ करने लगी तो तुम मुकर तो नहीं जाओगी ?
शैली- कुछ नहीं होगा यार ... यहाँ के सब इंसपेक्टर मेरे हुस्न के गुलाम हैं... एक नहीं कई हैं... जिसको बोलो छुड़वा सकती हूँ , जिसको बोलो उठवा सकती हूँ... तकलीफ यहाँ के लोगों से नहीं होती, तकलीफ होती है समाजसेवा के अधिकारियों से , वे यूज भी करते हैं और पैसे भी लेते हैं... फ़िर भी कभी-कभी केस बना देते हैं... ज्यादा खुन्नस हो या फ़िर कोई नया अधिकारी आया हो तो प्रेस को बुलवाकर अखबारों में फोटो भी छपवा देते हैं... इससे होता तो कुछ नहीं है... आराम से जमानत हो जाती है मगर बदनामी का डर बना रहता है... वैसे भी हमारा कौन सा नाम है जो इससे ज्यादा डरें...
दीपू- फ़िर तो युम्हारी बहुत पहचान होगी, किसी फ़िल्म वाले से नहीं है, अगर हो तो मैं उससे मिलूँ, मेरा भी काम हो जाए... तुम्हारे सहारे मुझे भी अपनी मंजिल मिल जाए...
शैली- दीपू, बहुत भोले हो तुम... ऐसी बात करते हो ... यहाँ पहचान की कोई कमी नहीं हैं मगर हर आदमी अपने फायदे की बात करता है... फ़िल्म वाले सब तो बुरे नहीं होते लेकिन सब अच्छे भी नहीं होते ... यहाँ हजार में से एक आदमी सही है... अब ना जाने वह सही आदमी कब मिल पाये...चिराग लेकर ढूंढते रहो....
दीपू- जो किस्मत में होगा वो देखा जायेगा... पहले तुम मेरी किसीसे सिफारिश तो करदो...
शैली- अच्छी बात है, एक निर्माता मेरी पहचान का है, वह सी ग्रेड की फिल्में बनाता है... एक नंबर का रसिया है... ओशिविरा में एक ऑफिस लेकर बैठा रहता है... पोस्टर लगाये रखेगा, जब कोई लड़की आएगी तो उसको सब्ज बाग़ दिखायेगा, उसको शीशे में ऐसे उतारेगा की फ़िर वह उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए तैयार हो जायेगी...
दीपू- ओह, फ़िर वह उस लड़की को काम नहीं देता ?
शैली- हाँ -हाँ देता है , क्यों नहीं देता... जब उसकी फ़िल्म बनती है तो छोटा -मोटा काम दे देता है... फ़िल्म में तो वैसे भी बहुत सारे कलाकारों की जरूरत पड़ती है, जिस दिन उसके चंगुल में कोई नई लड़की नहीं फंसती तो मेरे पास चला आता है, मेरे साथ रात गुजारकर उसे बहुत आनंद आता है॥
दीपू- क्या उसकी पत्नी नहीं है ?
शैली- ऐसे लोगों से कौन शादी करता है ? कई बार उसने मुझसे भी शादी का प्रस्ताव रखा था... मगर मैं जानती हूँ उसकी औकात ? वह शादी के बाद मेरा जिस्म भी इस्तेमाल करेगा और मेरी कमाई भी खायेगा, यानी मुझसे धंधा करवाएगा... ऐसे इंसान से क्या शादी करनी ? मैं कह दूंगी तो वह अपनी फ़िल्म में तुम्हें काम दे देगा ...

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