सवाल यह भी उठता है कि क्या यौन शिक्षा से बच्चे उन बातों के प्रति जागरूक होंगे या यौन संबंधी मामलों के प्रति और अधिक उन्मुख होंगे? यह सवाल अपने आप में काफी गंभीर है तथा कई और सवालों को खुद में समेटे हुए भी है। इसके विपरीत सेक्स शिक्षा के तहत इन बातों का भी ध्यान रखा जाता है कि समय से पहले शारीरिक संबंध बनाने से बचना चाहिए जिसका परिणाम अपरिपक्व उम्र में मां-बाप बनने के साथ ही अनेक अनपेक्षित परिणाम सामने आते हैं। अगर उनको इन परिस्थितियों में उचित सलाह या सूचना मुहैया नहीं कराई जाएगी तो इस तरह की घटनाओं में बढ़ोतरि के आसार हैं। यह तभी संभव है जब यौन शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जाए। इससे युवावर्ग सही फैसले करने में खुद को समर्थ पाएंगे।आज हम जिस माहौल में हैं उसमें यौन शिक्षा के बढ़ते हुए महत्व से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। यौन शिक्षा से न केवल बच्चों का दिमागी विकास होता है वरन उनमें विश्वास का संचार भी होता है। आम तौर पर युवावस्था की दहलीज पर पहुंचने के बाद उनमें यौन संबंधी अनेक धारणाएं घर कर लेती हैं। यही वह पड़ाव भी होता है जब कई तरह की शारीरिक परिवर्तनें भी दिखने लगती है। इससे बच्चों में डर और भ्रम की सी स्थिति पैदा हो जाती है। अत: सही समय पर सही जानकारी मुहैया नहीं कराई जाएगी तो बच्चों में द्विविधा की स्थिति बनी रहेगी तथा उनके गलत संगत में पड़ जाने की आशंका भी रहती है। इसलिए यह जरूरी है कि यौन शिक्षा की प्रारंभिक शुरूआत घर में ही की जाए। बच्चों को इस संदर्भ में बात करने से हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए की वे क्या बात करने जा रहे हैं। एक दोस्ताना माहौल में स्वस्थ यौन शिक्षा आज की जरूरत बन गई है। अगर हमलोग इसको शुरू करने में अभी भी हिचकिचाते हैं तो इसका मतलब है कि हम अनेक रोगों को दावत दे रहे हैं।बाबा रामदेव यौन शिक्षा का खुलकर विरोध कर चुके हैं.उनका कहना है कि स्कूलों में यौन की नहीं, योग की शिक्षा दी जाए। सरकार जिस तरह की शिक्षा देने की बात कर रही है उससे शिक्षा के मंदिर सेक्स के मंदिर बन जाएंगे जो समाज का सबसे बड़ा पतन होगा।इसी तरह शंकराचार्य जी मानते हैं कि कम उम्र में यौन शिक्षा देने की सोच ही मूलत: भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। इस उम्र में यौन के बजाय ब्रह्मचर्य के पालन की शिक्षा देना अधिक महत्वपूर्ण है ताकि इस दौरान विधाअध्ययन और कठिन परिश्रम के जरिये उनका स्वस्थ विकास हो और युवावस्था में वे सुखी गृहस्थाश्रम को अपना सकें शिल्पा- लेकिन ब्रह्मचर्य के बारे में तो विस्तार से बताना ही पडेगा . जब हम बच्चों से कहेंगे कि उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तब वे पूछेंगे नहीं कि यह ब्रह्मचर्य आखिर है क्या बाला ? वे इसके नफ़ा नुक्सान के बारे में सवाल करने से नहीं हिचकिचाएंगे , और उनका जवाब देना हमारी मजबूरी होगी. इस सवाल का विस्तृत और संभलकर जवाब देना ही यौन शिक्षा है. मेरा व्यक्तिगत विचार है कि यौन शिक्षा का प्रारूप ऐसा हो जिससे बच्चे सेक्स की तरफ उन्मुख न होने के बजाय सद्चरित्र की तरफ बढ़ें. तब तो इसका कोई मतलब है. वरना बेकार है. कम्मो- हाँ, मगर हर चीज के दो पहलू होते हैं.जैसे कि गोला -बारूद और बम भले ही नुकसानदेह हों मगर मानव हित के लिए वो भी जरूरी हैं. कुल मिलाकर मैं भी यहाँ तक पहुँची हूँ कि यौन शिक्षा अगर लागू की जाती है तो इस बात का विशेष ख़याल रखा जाये कि इससे किसी पर नकारात्मक प्रभाव न पड़ने पाए. और हो सके तो आगे चलकर सम्लेंगिक संबंधों के विषय में भी सही जानकारी दी जानी चाहिए . शिल्पा- मेरे ख़याल से अब हमको सो जाना चाहिए , जो काम सरकार का है, नेताओं का है , उसे उन्हीं पर छोड़ दो .
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Tuesday, June 22, 2010
प्यार से प्यारा , यार हमारा भाग-४४
कम्मो- आपके तर्क में दम है मेरी जान , मगर
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