Sunday, June 13, 2010

प्यार से प्यारा , भाग -३५

शिल्पा-ठीक है यार, कोशिश तो करती ही थी , अब तुमने कहा है तो और ज्यादा कर लूंगी , में जो भी लिखूंगी वह सेक्स और समाज के विषय में ही होगा। मेरी इच्छा है कि लोगों को सिखाया जाये, समझाया जाए, जो भी भ्रांतियां हैं , उनके निदान के लिए कोशिश की जाए।
शुभा - अच्छा विचार है, मुझे कोई ऐतराज नहीं है। जो भी लिखोगी, उसे पब्लिश करने की जिम्मेदारी मेरी है। अगर इसके लिए दो चार केस भी जाते हैं तो गम नहीं ।
शिल्पा- केस ? में समझी नहीं लिखने पर भला केस कैसे हो सकते हैं ? मेरा मतलब है कि में तो समाझ को सुधारने वाली बातें लिखूंगी। इसके लिए तो मुझे पुरस्कार मिलना मिलना चाहिए ।
शुभा - तुम्हारी बात अपनी जगह सही है मगर यहाँ उलटी गंगा बहती है। कुछ ऐसे सनकी लोग हैं जो आश्लीलता का बहाना बनाकर केस कर देते हैं। समाजसेवा शाखा के लोगों को पैसा चाहिए, अखबार वाले दे नहीं सकते इसलिए खीझकर केस कर डालते हैं। इससे होता कुछ नहीं, बस थोड़ा सा समय बर्बाद होता है । हम लोग इसके लिए तैयार रहते हैं। वकीलों की फ़ौज रहती हैअपने साथ। ऐसे मामले कोर्ट में ज़रा भी नहीं ठहरते । कई बार तो आई ओ को कोर्ट की फटकार भी सहनी पडी है, मगर आदत से मजबूर लोग क्या करें । वे अपना काम करते हैं और हम अपने काम में लगे रहते हैं।
कम्मो - तो क्या आपने उनके अखबार में लेख लिखे ?
शिल्पा- हा, शुरुआत में तो मैंने दो -चार लेख लिखे मगर फिर फुर्सत ही नहीं मिली। हांलाकि उनका रिस्पोंस बहुत अच्छा मिला था। हान, शुभा जरूर मिलती रही , सुख लेती-देती रही। अब भी आ जाति है कभी-कभी । अब वह मुझसे भी ज्यादा स्मार्ट हो गयी है और अभी तक उसने शादी भी नहीं की। कहती है कि इस खेल में जो मजा है , वह कहीं नहीं है ।
कम्मो- अच्छा , इतने बड़े घर की लड़की होकर भी शादी नहीं करती। उसके माँ- बाप उस पर दवाब नहीं डालते ?
शिल्पा- नहीं यार , जवान बच्चों पर से माँ- बाप का नियंत्रण हट चुका होता है । वे लोग अपनी इज्जत बचाने के लिए हा -हा करते रहते हैं। उसने अपनी माँ को बता भी दिया है कि पुरुषों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने से बहतर वह
किसी लड़की के साथ रिश्ता बनाना पसंद करती है। इसीमे उसे खुशी मिलती हैं। घरवाले सोचते हैं कि जिसमे औलाद की खुशी , उसमे उनकी खुशी । आखिरकार बगावत करने से फायदा भी क्या मिलता है ?
कम्मो- हां -हां , बच्चे भी माँ- बाप की इस कमजोरी का नाजायज फायदा उठाते हैं।
शिल्पा- हां, और यह सबके साथ होता है । जब हम बड़े होते हैं तो हमारे बच्चे भी हमको आँख दिखाने लगते हैं। वे समझते हैं कि उन्हें जीवन का लंबा अनुभव है इसलिए वे ज्यादा जानते हैं आर उनके बच्चे समझते हैं कि यह नया दौर है और इसमें बूढ़े लोगों को तंग नहीं अड़ा नी चाहिए ।
कम्मो- हां, तो ठीक है बुलाओ किसी दिन शुभा को । हम भी एक रात उसके नाम करना चाहेंगे ।
शिल्पा- तुम्हारी जीभ लार डालने लगी है क्या ? वैसे वो चीज भी ऐसी है । जब सम्बन्ध बनाओगी तब जानोगी , उसने तो बाकायदा अपने दिमाग से कई स्टायल भी ईजाद करली हैं। जब वह उनका इस्तेमाल करती है तो बहुत मजा आता है । मुझसे कह रही थी कि बाहर से ऐसा यंत्र बनाने वाली है जिसकी मदद से अकेले भी सुख भोगा जा सकता है। विदेशों में ऐसे खिलौने खूब बिक रहे हैं और लोकप्रिय हो रहे हैं.

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