Monday, January 11, 2010

मोहब्बत , भाग अंतिम

और वह मन ही मन राज को चाहने लगी थी, अपना समझने लगी थी लेकिन राज ऐसा निर्मोही था कि उस पर ध्यान ही नहीं देता था, वह समाजसेवा में ही मस्त था, पढ़ने के बाद जो समय मिलता , उसमे वह समाज कि भलाई के कार्य किया करता था, उसके पास प्यार मोहब्बत जैसी फालतू चीजों के लिए वक्त ही कहाँ था, जब कभी स्वीटी का मुकाबला राज से होता तो वह इस तरह नादाँ बनकर निकल जाया करता था जैसे कि वह उसे जानता ही न हो. पड़ोसी होने के कारण जान पहचान तो थी लेकिन राज बेरुखी भरा व्यवहार ही करता था. इससे स्वीटी के मन कि बेचनी बढ़ जाया करती थी, उसके मन का क्षोभ बढ़ता जा रहा था, उसे गम इस बात का था कि राज उसके सौंदर्य का अपमान कर रहा था, उसके जैसी बला कि सुन्दर लड़की कि तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखना हुस्न का अपमान नहीं तो और क्या था ? वह दुखी होकर राज को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगती, उसका घमंडी मन आहात हो चुका था. वह पहले से ही जिद्दी थी मगर राज के रूखेपन ने उस आग को और भी हवा दे दी थी, तभी तो उसने अपनी सहेलियों से मिलकर राज को मजा चखाने कि योजना बनाई थी. यह उसके षड़यंत्र का ही हिस्सा था कि पहले राज को अपने यौवन के जाल में उलझाया जाए और फिर उसका दिल तोड़कर उसे हमेशा के लिए तदपने के लिए छोड़ दिया जाए. इसी पर अमल करके पहले उसने राज के साथ अंतरंग रिश्ते बनाए और फिर तुरंत रंग बदलकर उस पर जबर्दस्ती करने का आरोप लगाने लगी. राज सचमुच डिस्टर्ब हो गया , लेकिन फिर भी उसने स्वीटी पर एक भी आरोप नहीं लगाया, वह खुद झुकता रहा मगर एक बार भी उसने स्वीटी पर आरोप नहीं लगे , उसकी शालीनता देखते ही बनती थी.वह गज़ब का धैर्यवान था. यूं तो स्वीटी उस पर बहुत गंभीरतापूर्वक आरोप लगा रही थी लेकिन धीरे धीरे उसको यह एहसास होने लगा कि राज के साथ वह कुछ ज्यादा ही ज्यादती कर रही थी,भले ही मन मन में वह राज से कितनी भी जलन रखती थी, लेकिन थी तो आखिर लड़की . और लड़कियों का मन बहुत भावुक होता है, स्वीटी भी आहिस्ता-आहिस्ता यह समझने लगी कि राज जैसा सच्चा और अच्छा लड़का इस दुनिया में मिलना मुश्किल है. वह सोच ही रही थी कि उसे राज कि आवाज सुनाई दी-

-मैं बहुत नादाँ हूँ , बिना सोचे समझे ही तुम्हें अपने दिल में बसा बैठा, तुमको अपनी बना बैठा, अपने दिल में मोहब्बत का मंदिर बनाकर उसमे तुम्हारी तस्बीर लगा बैठा. मैं क्या जानता था कि मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूँ, तुम्हारे दिल को मेरे कारण जो ठेस पंहुची है, मुझे इसका बहुत अफ़सोस है. मैं कोशीश करूँगा कि इस तकलीफ को थोड़ी सी कम कर सकूं. यह संभव भी है कि नहीं, पता नहीं.

स्वीटी- चुप रहिये राज... अब मैं कुछ नहीं सुनना चाहती.

राज- पता नहीं तुम मुझे कभी माफ कर पाओगी भी नहीं ? सारी गलती मेरी ही है, जब तुम मना कर रही थीं तो मुझे छोड़ देना चाहिए था. मैंने ही तुम्हारी हर बात मानने का वादा किया और मैं ही भूल गया, मैं तुमसे प्यार का दावा भी करता रहा और तुम्हारे दिल कि भावनाओं को भी नहीं समझ पाया, लानत है ऐसी मोहब्बत पर. सच कहती हो तुम, मैं बलात्कारी ही हूँ, मुझे सजा होनी ही चाहिए. मेरी शिकायत दर्ज होनी चाहिए. दस-बीस साल जेल की हवा खाऊंगा तो अक्ल आएगी.

स्वीटी- नहीं राज. ऐसा मत कहिये. तुम बहुत अच्छे हो , तुम गुनाहगार नहीं बल्कि देवता हो. मोहब्बत के देवता. म्फब्बत के मसीहा हो तुम, तुमने मेरी आँखें खोल दीं, मोहब्बत कि असली परिभाषा बता दी है तुमने, आज मैंने जाना कि जो मोहब्बत करता है वह अपने चाहने वाले पर आरोप लगा ही नहीं सकता, उसके अपने महबूब में कुछ नेगेटिव दिखता ही नहीं, दिखेगा भी कैसे ? वह तो हर समय महबूब की मोहब्बत में खोया रहता है, मुझे माफ कर दीजिए, मैं तुम्हारी मोहब्बत की परिक्षा ले आरही थी, मैंने ही तुम्हें जिस्मानी संबंधों के लिए उकसाया और फिर तुम्हें भड़काने के लिए ऐसे गंभीर आरोप लगाए , मगर तुम तो मोहब्बत के सच्चे मसीहा निकले .... समाप्त ...

कल से पढिये एक और धारावाहिक कहानी.

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