क्या एड्स के अलावा और भी कुछ अन्या गंभीर बीमारियाँ हैं जो हमारे जीवन को नरक बना सकती हैं ? या फिर ये सिर्फ डराने के वजह से फैलाई गयीए बातें हैं ? क्या हम बिना सेक्स पूरा जीवन बिता सकते हैं ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं मुझे जिनके जवाब चाहिए ।
मुंशीजी- सवाल एक साथ किये गए हैं मगर इनका जवाब एक साथ संभव नहीं है। देने को तो दे दूं मगर तुम उस्ससे संतुष्ट नहीं हो सकतीं, और अगर ऐसा नहीं होगा तो फिर फायदा क्या ,जहां तक कंडोम कि बात है तो यह शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए बहुत ठीक उपाय है, इससे गर्भ ठहरे कि संभावना बहुत कम हो जाती है, अगर वह लगाते समय फट जाता है या हम उसको ठीक तरह से नहीं लगाते तो यह दूसरा मामला है। अब यह कहना कि यह शत प्रतिशत कारगर उपाय है, ठीक नहीं है। कई बार ऐसा देखा गया है कि कंडोम लगाने के बाद भी सामने वाले को बीमारियाँ हूई हैं या सम्बंधित महिला गर्भवती हूई है। मैं यह बात पूर्व में घटी घटनाओं और समाचारों अथवा जन सूत्रों पर अआधारित बता रहा हूँ।
छमिया- और वो सवाल कि एड्स का हौव्वा कहीं कंडोम कंपनियों का खडा किया हुआ तो नहीं ताकि उनके प्रोडक्ट्स ज्यादा बिक सकें ।
मुंशीजी- यह शंका सच भी हो सकती है और गलत भी क्योंकि आज तक सरकार न कंडोम के लिए परमिट प्रणाली तो शुरू नहीं की, यानी कि किसी एक कंपनी का तो इस पर एकाधिकार है नहीं। बहुत सारी कम्पनियां कंडोम बेच रही हैं। लोग अवही खरीदते हैं जो उनकी कसौटी पर खरा उतरता है। यहाँ तक कि सरकार की तरफ से तो ये मुफ्त में दिए जाते हैं, फिर भी लोग गुणवत्ता के आधार पर बाहर का माल खरीदते ही हैं। अब तुम खुद सोचो कि सच्चाई क्या हो सकती है ?
छमिया- तो इसका इस्तेमाल ज्यादा क्यों नहीं करते लोग ?
मुंशीजी- जहां तक मेरी बात है, मुझे मजा नहीं आता, मैं ऐसे ही प्यार करने में खुश होता हूँ , कुछ मुझे झंझट लगता है। हाँ, अगर मैं किसी बाहरी महिला के साथ सम्बन्ध बनाता हूँ तो सुरक्षा का इंतजाम जरूर करता हूँ।
छमिया- तुम्हारी अपनी तो कोई है ही नहीं .
मुंशीजी - नई सदी की शुरुआत में सब कुछ बदल गया है। प्रेम की भाषा और परिभाषाएँ भी बदल गई हैं। शब्दों के रूप बदल गए हैं। इस बदलाव में भाषा को बेलगाम जबान मिली है। भाषा और जबान पर आ टिका है कामुकता का भाव जिसे अभिव्यक्त करता है एकमात्र 'सेक्सी' शब्द।आधुनिक भाषा शास्त्र में सेक्सी शब्द ऐसा रूप ले चुका है, जो किसी की तारीफ में भी यह कहा जा सकता हैं कि ''आप कितनी सेक्सी लग रही हैं''। सेक्सी शब्द आज के दौर की युवा पीढ़ी की शब्दावली का अभिन्न हिस्सा बन गया है, जो उनकी मनोभावनाओं को बेहद आसानी से व्यक्त करने में सहायक होता है। सेक्सी शब्द 'ढाई अक्षर प्रेम के' का नए ढाई अक्षरीय रूप में पुनर्जन्म है, जो हमेशा कामुकता की ओर इशारा नहीं करता बल्कि माहौल व उस में समाई चीजों को एक खास रूप से पेश करता है।आज पूरा का पूरा माहौल सेक्सी सुविधाओं व कृतियों से भरा हुआ है। कंप्यूटर सेक्सी है, टीवी पर न्यूजरीडर सेक्सी है, म्यूजिक सिस्टम सेक्सी है, बाथरूम सेक्सी है तो फ्रिज का लुक सेक्सी है। पोशाकें तो सेक्सी हैं ही। अब तो जूते, चप्पलें तक भी सेक्सी हो चले हैं।मुद्दे की बात यह है कि सेक्सी शब्द ऐसा साफसुथरा किंतु शरारतपूर्ण शब्द बन चुका है, जो मन के किसी कोने में पैदा हुई यौन इच्छा से जुड़ी गुदगुदी को जगा देता है। देखने में सुंदर, साफसुथरे ऑफिस को 'सेक्सी ऑफिस' कह दिया जाता है। मेज के कोने पर रखा नए मॉडल का आकर्षक कंप्यूटर या लैपटॉप, कुर्सियों की नरम गुदगुदा देने वाली गद्दियाँ आदि सब कुछ सेक्सी होने में शुमार हो जाते हैं।सड़कों पर मचती धूमकरीब 10-12 साल पहले देश की सड़कें सूनी नजर आती थीं। उन पर फिएट और एंबेसडर कारें और बहुत हुआ तो मारुति कारें दिखती थीं पर अब सड़कों पर 'सेक्सी कारों' की भरमार है। किसी का अगला हिस्सा सेक्सी है तो किसी का पिछला हिस्सा सेक्सी है। कामुकता पैसे की बैसाखियों पर सवार होकर ज्यादा इठलाती है। रईसों के लिए सफलता भी सेक्सी है और पैसा भी सेक्सी है। आज के परिवेश में पैसा और सफलता भी कामुकता पैदा करती है।हाऊ सेक्सी'प्यार' बाजार में मिलने लगा डब्बों में पैक हो कर रेडीमेड। प्रेम की भावना खुलेआम देशीविदेशी कार्ड कंपनियों द्वारा कभी कार्ड की शक्ल में, कभी गुब्बारों की शक्ल में। कभी छोटेबड़े टैडिबीयरों की शक्ल में दुकानें पर बिकने के लिए रखी जाने लगी है। मुँह से बोलने के लिए जबान ने सिर्फ एक ही शब्द चुना 'हाऊ सेक्सी'।सौंदर्य अब फड़कता, दमकता रोकड़ा बन गया है जिसे कैश कार्ड की तरह भुनाया जा सकता है। सौंदर्य प्रतियोगिता में अब लोग अपनी बेटियों की नुमाइश शौक से करते हैं क्योंकि अगर इस से नोट कमाए जा सकते हैं तो क्या बुराई है। सौंदर्य को ताकत समझा जाने लगा है। हर छोटाबड़ा शहर अपनेअपने तंबू तान कर अपनी-अपनी नजरें सिंकाई का सामान इकट्ठा करता है और कहा जाता है 'काफी सेक्सी शो था।'जिम्मेदार कौनपरफ्यूम की खुशबू में डूबा, महकता शरीर सेक्सी लगता है। आफ्टर शेव लोशन की महक पुरुष को ज्यादा सेक्सी बना देती है। विज्ञापन कंपनियां आलू के चिप्स से ले कर कमर के दर्द के मलहम तक सेक्सी अंदाज में पेश करने में पीछे नहीं रहती। सब कुछ घूमफिर कर सेक्सी अंदाजों में डूब कर दर्शकों व ग्राहकों को अपनी ओर खींचता है।माहौल पर हावीसेक्स माहौल पर इतना हावी कब और कैसे हो गया, पता ही नहीं चला।
Saturday, January 30, 2010
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