भाग-५
छमिया ने मुंशीजी की तरफ ऐसे देखा जैसे वह उसकी बात से सहमत होने की कोशिश कर रही हो. फिर अपनी आवाज में सख्ती लाते हुए उसने कहा-
-मैं ऐसी –वैसी नहीं हूँ मुनशीजी , भले ही जान निकल जाए मगर मैं तुम्हारे हाथ लगने वाली नहीं हूँ. मैं अपने मोहल्ले की दूसरी लड़कियों जैसी नहीं हूँ. भले ही मेरे माँ –बाप गरीब हैं मगर वे इज्जतदार हैं. हम लोग रूखी –सूखी खाकर भी खुश हैं. मैं जानती हूँ तुम हमें उधार क्यों देते हो, मेरी खातिर ही न, वरना बिना स्वार्थ के तो तुन चीटीं को भी दाना डालने वाले नहीं हो .
मुंशीजी- तुम जो कहो कहती रहो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता , मैं बस इतना जानता हूँ की जीवन में पैसा भी बहुत अहम रोल निभाता है, अगर तुम ये कमा सकती हो तो कमाती क्यों नहीं हो, लक्ष्मी तुम्हें बुला रही, तुम्हारा द्वार खटखटा रही है और तुम हो की उसे ठुकराए ही जाती हो, ऐसा गज़ब क्यों करती हो, आ जाओ मेरी बांहों में, तुम्हारी सब दरिद्रता दूर कर दूँगा. यकीन मानो मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ.
छमिया ने नखरा दिखाते हुए कहा-
-अच्छा मैं भी तो जानू कि मेरे लिए तुमने अपने मन में क्या- क्या अरमान सजाकर रखे हैं ? क्या चाँद सितारे तोड़ने वाले हो मेरी खातिर ?चलो हटो, ये काम तुम्हारे बस का नहीं है, कोई नया लड़का ही ऐसी बात कह और कर सकता हूँ, जितनी देर मैं तुम्हारे पास खादी हूँ, अगर तुम्हारी जगह पर कोई हम उम्र लड़का होता तो हजारों वादे कर डालता और एक तुम हो कि बस बुड्ढों जैसी बात करने पर तुले हुए हो .मुंशीजी- ऐसा मत कहा करो, दिल को बुरा लगता है, मैं अभी जवान हूँ, जवान लड़कों से अच्छा परफोर्म कर सकता हूँ, मैं प्रेम करने का हर तरीका जानता हूँ, तुम्हें भी प्रणय क्रीडा में निपुण कर दूँगा. मेरा भरोसा करो, एक बार मुझे इस अमृत रस को पीने कि इजाजत दे दो.
छमिया- इस अमृत को तो वही पिएगा मुन्शीजी, जो मेरे दिल का राजा होगा, जो मेरे मन को कब्जे में करेगा , जो मेरा दिल चुराएगा . समझे. ये कोई प्रसाद नहीं है कि इसे हर किसीको बाँट डालूँ,
मुन्शीजी- तो क्या मैं नहीं हूँ तुम्हारे दिल में , मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता ? अगर ये बात सच होती तो अब तक तुम यहाँ नहीं खादी होतीं , चली गयीं होती अपने घर और वहाँ से अब तक कोई न कोई शिकायत करने आ गया होता , तुम भी समझी ?
छमिया- सही बात है , मैं भी सिर्फ इसलिए रुकी हूँ क्योंकि तुमने आत्महत्या करने कि धमकी दी है , मैं नहीं चाहती कि कोई बुजुर्ग मेरी वजह से मारा जाए,
मुंशीजी- ओहो , मैं कितनी बार समझा चुका हूँ कि मुझे ऐसा मत बोलो, मुंशीजी ही ठीक है, तुम तो मुंशी भी कह सकती हो, खुशी होगी मुझे .मैं तुम्हें जितना सुख दे पाऊंगा उतना दूरसा कोई नहीं दे सकता, जानती हो मैंने पूरा काम शाश्त्र पढ़ा है . पत्नी को बिस्तर पर कैसे खुश रखा जाता है इसका ज्ञान मुझसे ज्यादा किसीको नहीं हो सकता. तुम चाहो तो मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ. दूकान में से आधा हिसा तुम्हें दूँगा, तुम्हारे लिए अलग से प्लाट खरीदकर बढ़िया दोमंजिला मकान भी बनवा दूँगा. कोई टेंशन नहीं है. तारे –वारे तोड़ने वाली बात सब खोटी होती हैं, तुम जानती हो उनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं होता.मगर मैं व्यवहारिक हूँ, कोई झूठा वादा नहीं करता . जो सच है वो सच है. झूठी बात करना मुझे पसंद नहीं , बस सबके सामने इस शादी को गुप्त रखना होगा.
छमिया- इसका मतलब तुम मुझे रखैल बनाकर रखना चाहते हो. सीधे –सीधे क्यों नहीं कह देते, मुझे भी घुमा फिराकर कहने कि आदत नहीं है. साफ़ कहती हूँ, मुंह पर कहती हूँ चाहे अच्छा लगे या बुरा. जूती मारती हूँ ऐसे प्लाट और दूकान पर . समझे ?
Saturday, January 16, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment