Wednesday, January 6, 2010

मोहब्बत , भाग-७०

राज- और मैंने यही तो किया, फिर जो कुछ हुआ सो हुआ , मैं क्या कर सकता हूँ, मजा तुमने भी तो लिया.सच कहूँ तो तुमने मुझसे भी ज्यादा आनंद लिया है, भूल गयी उन क्षणों को जब तुमने मुझे कसकर पकड़ लिया था और मेरे इस संवेदनशील अंग पर तुमने मालकिन की तरह कब्जा जमा लिया था.

स्वीटी- नहीं, यह झूठ है, मैं इसे देखते ही डर गयी थी, पसीने- पसीने हो गयी थी. मैंने साफ़ इनकार भी क्र दिया था लेकिन तुम नहीं माने , तुम जोर जबरदस्ती करने लगे थे. अगर मैं कोई सख्त कदम उठाती तो भी तुम मानने वाले नहीं थे. मैंने महसूस किया की तुम्हारी आँखों में खून उतर आया था. मैं अगर ज्यादा इनकार करती तो संभव है तुम मेरी जान ही ले लेते .

राज- तुम्हारी तबियत तो ठीक है, मैं अपनी जान की जान लूँगा. अरे अगर राह में कोई चींटी भी घायल हो जाए तो मैं अपने सीने में दर्द महसूस करता हूँ.अगर रास्ते में कोई पक्षी भी परेशान दिखा तो मैं उसको अस्पताल तक पहुचाता हूँ, इसके बावजूद तुम कहती हो की मैं तुम्हारी जान ले लेता. यह हास्यास्पद मगर मुझे तकलीफ पहुचाने की बात है .

राज अपने दिल को मसल रहा था और स्वीटी मन ही मन खुश हो रही थी. राज की तकलीफ उसको खुशी प्रदान कर रही थी. किसी अजीब दुनिया है ये, यहाँ पर लोग अपनी खुशी से कम खुश होते हैं और दूसरों के दुःख से ज्यादा खुश होते हैं. यह आम बातें हैं जो संभवतह हर जगह, हर शहर और हर देश में मिल जायेंगी. राज अपने आपको ही कोस रहा था, काश, वह सपना के साथ ही नहीं आता तो पार्टी में उसकी मुलाक़ात स्वीटी से भी नहीं होती और स्वीटी के साथ उसकी इतनी नजदीकियां भी नहीं बढ़तीं, ना ही अब उसे इस स्थिति का सामना करना पड़ता. वह उस मन्हूश घड़ी को कोसने लगा जब उसने शराब को हाथ लगाया और फिर उसीके चक्कर में वह स्वीटी के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बना बैठा, अब उसे समझ आया की वह जो भी अपने बुजुर्गों से सुना करता था वे सब बातें ठीक थीं. वह स्वीटी के असली रंग को पहचान ही नहीं पाया था. और अब जाना भी तो बहुत देर हो चुकी है. राज ने कुछ सोच समझकर कहा-

-अब जो हुआ सो हुआ उसे तो वापस लाया नहीं जा सकता मगर तुम जो भी बोलो मैं करने के लिए तैयार हूँ. तुम कहो तो पैर पकड़ कर माफी मांग लूं. तुम कहो तो मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ, इसके लिए मुझे कोई जल्दबाजी भी नहीं है, जब चाहोगी हम कर लेंगे. कोई और विकल्प हो तो वो भी कहो .

स्वीटी- एक बार क़त्ल करके सोरी बोलने से कुछ नहीं होता. जो इज्जत एक बार चली गयी वह तो वापस नहीं आती.

राज- इज्जत की बात तब आती है जब कोई जबरदस्ती करता है, धोखे से करता है, या बहला फुसलाकर करता हिया. तुम्हारे और हमारा मामला अलग है. यहाँ जो कुछ भी हुआ वह आपसी सहमति के बाद हुआ , तो इसको प्यार कहते हैं, इश्क कहते हैं. मैं पहले भी तुम्हारे बेहद इज्जत करता था और अब भी बहुत इज्जत करता हूँ, तुमसे प्यार करता हूँ मैं.

स्वीटी - कहना आसान और करना बहुत नुश्किल होता है, अब मैं अपने घर किस मुंह से जाऊं , कैसे नजर मिलाऊँ लोगों से, औरत के पास और होता है क्या है, मैंने इस उम्र तक इस कुमारी को बचाकर रखा था और तुमने सब तहस-नहस कर दिया. बर्बाद कर डाला मुझे . लूट ली मेरी इज्जत.

राज- तो फिर एक ही रास्ता बचता है , मेरा गला दबा दो , उतार दो मौत के घात. मैं कुछ नहीं कहूँगा. तुम्हारी खातिर मैं ऐसा करने के लिए भी तैयार हूँ. कहो तो मैं खुद ही जहर खाकर जान दे दूं, मगर तुम खुश रहो.

स्वीटी- जान देने की बात तो कायर करते हैं. मर्द नहीं.






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