Monday, January 25, 2010

भाग-१४
जब हमारे होठों से होठ मिलेंगे , सीना से सीना मिलेगा और हम दोनों एक दुसरे में समा जायेंगे तब पता चलेगा कि असली सुख क्या होता है, तब जानोगी कि स्वर्ग किसको कहते हैं ?तुम्हारे मन के तार झन्ना जायेंगे , दिल बाग-बाग हो जाएगा . जिस तरह वीणा के तार झंकृत होने से मन प्रफुल्लित हो जाता है, उसी तरह की अनुभूति होगी .
छमिया- वाह, जब पहले ही इतना सुखद अनुभव हो रहा है तो आगे क्या होगा , मैं कल्पना कर सकती हूँ लेकिन अपने आपको समर्पित कब करूंगी मैं तुम्हें बता ही चुकी हूँ.
मुंशीजी- मुझे भी कहाँ इनकार है ? मैं तैयार हूँ और उसी दिशा में काम कर रहा हूँ. मगर तुम तो जैसे पत्थर की बनी हुई हो, टस से मस होने का नाम ही नहीं ले रही हो. फिर भी मेरी कोशिशे जारी हैं, और कोशिश हमेशा कामयाब होती है, बस मलाल इस बात का है कि मैं जो मेहनत कर रहा हूँ इससे आनंद तो हम दोनों उठाएंगे मगर परेशान मैं अकेला हो रहा हूँ.
छमिया- अकेले कैसे कह सकते हो, मैं भी यहाँ पर तुम्हारे साथ हूँ, और अब तो तुमने मुझे अपनी बांहों में भी कैद कर लिया है. पहले कहते थे कि दूर से ही बात करेंगे .
मुंशीजी ने छमिया के गदराए हुए बदन को आहिस्ता-आहिस्ता दबाना शुरू कर दिया, उनका हाथ छमिया की उन्नत गोलाइयों तक पहुच गया था, कई बार छमिया ने उनका हाथ वहाँ से हटाने की कोशिश भी की मगर सफलता नहीं मिल पायी. मुंशीजी खेले खाए फ़कीर थे , ना जाने कितनी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा चुके थे , इसलिए ऐसी तरकीब भिडाई कि वह नाराज भी नहीं हुई और वे अपने काम में लगे रहे . छमिया का बदन थर –थर कांपने लगा, जिस्म के रौंगटे खड़े हो गए, वह अपने आपको आसमान में उड़ता महसूस कर रही थी, उसका विरोध काफी कमजोर पड़ चूका था. सारा जोश ना जाने क्यों नशे में बदलता जा रहा था. उसको मुंशीजी कि आवाज सुनाई दी-
-जी करता है कि तुम इसी तरह हमेशा मेरे साथ रहो और मैं तुम्हें अपनी आगोश में भींच लूं, मेरा दिल इस वक्त मेरे कब्जे में नहीं है, मगर तुम फ़िक्र मत करना, मैं अपना वादा नहीं तोडूंगा. वही करूँगा जो तुमसे कह चुका हूँ, वचन की मर्यादा समझता हूँ, हांलाकि यह मेरा प्यार है , इसमें कहीं कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन फिर भी अब मैं यहाँ से आगे बढ़ने से डरता हूँ.
छमिया- झूठे कहीं के , सब कुछ करते हो और मुकर भी जाते हो, वो भी तुरंत. पहले कहा था कि हाथ नहीं लगाएंगे , और अब छोड़ने का नाम भी नहीं ले रहे हैं.
मुंशीजी- क्या तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा, सच –सच बताओ क्या तुम्हारी इच्छा नहीं हो रही ?
छमिया- कैसी इच्छा ?साफ़-साग कहो मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ.
मुंशीजी- अच्छा जी... मुझे नहीं लगता तुम इतनी नादाँ हो, अपने दिल में झांककर देखो. जवाब मिल जाएगा, तुम्हारी आँखों से भी प्यास साफ़-साफ़ झलकने लगी है.
छमिया- बिलकुल नहीं, यह डर और घबराहट कि वजह से ऐसा हो रहा है।
मुंशीजी ने मौका देखकर चौका मारना उचित समझा , जब जान लिया कि छमिया बातों में उलझ गयी है तो अपना हाथ उसके यौवन द्वार कि तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया.


मुंशीजी- झूठ, सफ़ेद झूठ. मैं नहीं मानता. डर नाम की अगर कोई चीज होती तो तुम अब तक कई बार टोक चुकी होती, तुम जानती हो कि यहाँ पर कोई नहीं आएगा. यह भी सच है कि जब तुम्हारी और मेरी मर्जी है तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.अगर तुमने मेरा साथ देने का वादा किया तो मैं सबसे लड़ सकता हूँ, तोड़े में ही इतना जानलो कि तूम्हें पाने के लिए मैं कुछ भी खो सकता हूँ.
छमिया- झूठ, फिर झूठ. जब सबको पता चलेगा कि मुंशीजी ने छमिया को अपनी रखैल बना लिया है तो तुम्हारे भाई की पत्नी ही तुमको बराबर कर देगी, फिर उसके साथ मौज कर पाओगे ?
मुंशीजी- जब तुम मिल गयीं तो सारी दुनिया मिल गयी मुझे फिर कोई हसरत नहीं रह जायेगी

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