Friday, January 15, 2010

छमिया , भाग -०४
मुंशीजी के दिल पर पहाड़ सा टूट पड़ा , जिस कमसिन फूलझडी को वह अपने दिल में बसाना चाहता था , वही उसकी नजरों से ओझल हो रही थी, उसका दिल बैठने लगा. हिम्मत जुटाकर आवाज दी-
-छमिया , सुनलो छबीली . अगर आज गयीं तो मुझे ज़िंदा नहीं पाओगी. पीछे लौटो . आओं एक बार वरना मैं जान दे दूंगा . अब तो बस जान ही जायेगी ....
और फिर अगले ही पल चमात्कार हो गया, छमिया गेट बंद करके अंदर घुसी चली आ रही थी. मुंशीजी की आँखें हैरत से फटने लगीं, तो क्या छमिया सचमुच उससे प्यार करने लगी है , अगर ऐसा नहीं होता तो वह वापस क्यों आती ? और खुद ही गेट बंद करके क्यों आती ? क्या इसका मतलब वह भी जवानी का आनंद चखना चाहती है , वह इन्हीं ख्यालों में उलझा था की छमिया की खनखानाती आवाज आई –
-मरना है तो गंगाजी में जाओ न, मेरे मत्थे ह्त्या क्यों जड़ते हो ? बड़े आये जान देने वाले .
मुंशीजी- जब तक मैं तुम्हारे जोवन का रस नहीं चख लेता तब तक किसी भी हालत में मरने वाला नहीं हूँ, तुम समझती नहीं, किस हद से गुजर चुका हूँ जानती भी हो की नहीं ? अरे मेरे तन-बदन में आग लगी है और तुम मुस्करा रही हो, इसी मुस्कान, बस इसी मुस्कान पर तो मेरी जान अटकी हुई है.
छमिया- आप भी उल्लू बनाने में माहिर हैं मुंशीजी, क्या तुम्हारे छोटे भाई की पत्नी से तन की आग शांत नहीं होती जो मेरे पीछे पड़े हुए हो. मैं भी सब कुछ जानती हूँ तुम्हारे बारे में , तुम्हारा भाई दूकान में सोता है और तुम उनकी पत्नी के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो ..
मुन्शीजी- तो क्या मुफ्त में मजे उडाता हूँ, ये सारी दौलत किसके लिए है ?मगर अब उसमे दम नहीं रहा , कहाँ वह बूढ़ी खाल और कहाँ तुम करारा माल . तुम्हारे साथ प्यार करने में अलग ही मजा आएगा.
छमिया- जब वह कड़क थी तो मजा आता होगा ?
मुंशीजी- हाँ, तब की बात अलग थी, तब तो वह ऐसी लगती थी जैसे की इलाहाबादी अमरुद, वो गदराया बदन, वो कसी हुई जवानी , मगर तुमसे ज्यादा अच्छा नहीं. जिस तरह तुम्हारा आकर्षक सीना है वह मैंने बहुत कम देखा है, मैं इन गोलाइयों का बड़ा शौकीन हूँ, इन्हें छूने और मसलकर प्यार करने की बड़ी इच्छा है. आओ ना करीब आकार बैठो, मैं तुम्हारी सभी तकलीफों को दूर कर दूंगा.
छमिया- मैंने सुना है अपनी जवानी में तुम बड़े रंगीन मिजाज थे, यहाँ तक की जब तुम्हारे भाई की शादी हुई तो उसे तो शराब पिलाकर तुमने अलग सुला दिया था और दुल्हन के साथ तुम्हीं ने सुहागरात मनाई थी ? सच है ये ?
मुन्शीजी- हाँ, छमिया. मैं तुमसे कोई बात नहीं छिपाऊंगा. यह भी सच है की तुम्हारे मोहल्ले में दो चार को छोड़कर सभी महिलाओं के साथ मैं मौज मस्ती कर चुका हूँ, मगर जबसे तुम पर नजर पडी है, यहीं पर आकार ठहर गयी है, तुम्हारे सिवाय कोई निगाह में चढता ही नहीं है.
छमिया- मेरा सपना छोड़ दो मुंशीजी, मैं तुम्हारे हाथ आने वाली नहीं हूँ, मैं जानती थी की तुम ऐसे ही कमीने हो इसीलिए मैंने कभी खुद कोई चीज तुमसे उधार नहीं ली, वरना उधार के बदले इज्जत की मांग कर बैठते. है न ?
मुंशीजी- तुम कुछ भी बोलो छमिया, मैं बुरा नहीं मानता. मुझे हर बात अच्छी लगती है. तुम भले ही जूतों से मार लो लेकिन एक बार, ऐ छमिया. बस एक बार इस यौवन का आनंद उठाने दो. मुझे मस्ती के रंग में रंग जाने दो.

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