Sunday, January 3, 2010

मोहब्बत , भाग-६७
ताकि फिर कोई इच्छा , फिर कोई आरजू, फिर कोई उमंग बाकी न रहे, आ जाओ इन बांहों में, समा जाओ इन बांहों में , चखलो जवानी का असली आनंद , अगर एक बार रस को लूट लोगी तो फिर कोई तकलीफ नहीं हो पाएगी. मैं अपनी हसरत पूरी कर लेना चाहता हूँ, और तुमसे भी कहता हूँ की डर के आगे जीत है, इस डर को अपने दिलो दिमाग से निकाल फेंको , फिर देखो कहीं कोई मुश्किल नहीं होगी, कहीं कोई रुकावट नहीं होगी, अच्छा या बुरा सब कुछ हमारी फीलिंग्स के ऊपर निर्भर करता है. अगर हम खुले आसमान के नीचे भी संतुष्ट हैं तो वे सुकून भरी नींद सो सकते हैं. मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है लोगों को जमीन पर सोते हुए, उन्हें कोई तकलीफ नहीं होती, उन्हें कोई गम नहीं होता, वे आराम से खाते हैं, खुश होते हैं और किसीसे कोई शिकवा नहीं करते, वे संतुष्ट हैं तो इसीलिए सुखी भी हैं. इसके अलावा वे लोग भी हैं जो बहुत कुछ मिल जाने पर भी सब कुछ पाने की लालसा करते हैं और हमेशा दुखी रहते हैं,
स्वीटी- प्लीज, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.
राज- इस जवानी का अचार डालोगी क्या ? जब तक है , तब तक इसका इस्तेमाल करो वरना ढल जाने पर कोई नहीं पूछेगा , यह मेरा डायलोग नहीं है बल्कि मैंने इसको एक फिल्म से याद किया है, मगर सटीक है , सही सिच्युएशन पर मारा है .
स्वीटी खामोश हो गयी, राज का हौसला हर पल बढ़ता ही जा रहा था, वह चाहकर भी असली मंजिल तक नहीं पहुच पा रहा था, वह चाहता था की पहले की तरह स्वीटी ही पहल करे और स्वीटी चाहती थी की यहाँ तक पहुचने में उसने बहुत पहल करली यहाँ से आगे अब राज ही पहल करे. आखिरकार राज को अपनी मर्दानगी का लाभ उठाना पड़ा , उसने नग्न स्वीटी के घुटनों को एक तरफ मोड दिया और उस पर हावो होना शुरू कर दिया, यह बहुत सुनहरे पल थे. दोनों के जिस्म काम्ज्वाला की आग में झुलस रहे थे. दोनों के होठ भी एक दुसरे के होठों से सटे हुए थे और फिर स्वीटी और राज उस हसीं गुनाह की तरफ बढ़ने लगे जिसके लिए वे लोग बहुत देर से तरस रहे थे. उन दोनों की साँसें फूल रही थीं. काम्ज्वाला ने उनको अपने आगोश में ले लिया. कुछ देर के बाद ही उनकी कामाग्नि शांत हो गयी. स्वीटी खूब चीखी चिल्लाई मगर थोड़ी देर के बाद उसे सब कुछ अच्छा लगने लगा था, वह राज का खुलकर साथ देने लगी थी. जब गर्मी पिघल गयी तो दोनों शांत हो गयीं, तो बदन ढीले होने लगे. सारी नैतिकता , सारी सज्जनता धरी की धरी रह गयी. राज कितना समझदार बनता था, होशियार बनता था. वह संस्कृति और सभ्यता का प्रहरी बनता था मगर जवानी के जोश के आगे वह भी नतमस्तक हो गया. झुक गया और काम वासना का गुलाम होकर वही भूल कर बैठा, जिसे अक्सर लोग जवानी में कर बैठते हैं. स्वीटी भी योग्य थी, विद्वान थी, बुद्धिमान थी मगर राज को बर्बाद करने के चक्कर में वह खुद ही बर्बाद हो गयी. यही होता है , जब हम किसी दूसरे को गिराना चाहते हैं तो उस चक्कर में पहले हम खुद ही गिर जाते हैं. यह जवानी की कहानी होती ही दीवानी है, यहाँ पर कदम बहुत संभाल-संभालकर रखने पड़ते हैं. और जब हम मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है की कहीं न कहीं फिसल ही जाते हैं, ये है इस जवानी की रवानी का दस्तूर. जब जोश होता है तो कोई होश नहीं रहता और जैसे ही जोश ठंडा होता है तो सब हिसाब-किताब लगने शुरू हो जाते हैं. अच्छे –बुरे का ध्यान आने लगता है .
स्वीटी और राज के साथ भी तो यही हुआ, जब तक जवानी का खुमार था वे कामरथ पर सवार होकर आगे बढते गए , और जब बिलकुल करीब आकर एक दूसरे में समा गए, दो जिस्म एक जान बन गए तो ध्यान आया की उन्होंने कितनी बड़ी हद पार करदी है. जब तूफ़ान आकार गुजर गया तो स्वीटी बोली-
-यह क्या हो गया , हम लोग ये क्या कर बैठे ? आह. अब क्या होगा राज ?
राज- कुछ नहीं होगा, जो होना था सो हो गया... कोई चोरी तो नहीं की, किसीका डाका तो नहीं डाला. यह प्यार है , हम लोगों ने प्यार किया है, तुम्हीं ने तो कहा था की हम लोग बालिग़ हैं , और अगर अपनी इच्छा से एक दूसरे के जिस्म से कुछ सुख लेते हैं तो इसमें बुरा भी क्या है ?हम लोगों ने पूरे होशो हवास में ये क्षण शेयर किये हैं.
स्वीटी – लेकिन समाज तो इसे गलत मानता है न. शायद इसीलिए दिल में कुछ गलत हो रहा है. लगता है जैसे कुछ ठीक नहीं किया .

No comments: